भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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कुछ पिट्ठुओंने शोषितोंके आँसू पोंछने, उन्हें शान्त रखने, विद्रोह न करनेके लिये ही इन सबको गढ रखा है। चार्वाकोंने भी धर्मके सम्बन्धमे ऐसी ही उल्टी-सीधी कल्पना की है। वस्तुतः महात्मा, आप्तकाम, परम विरक्त महर्षियोंने परम सूक्ष्म ऋतम्भरादृष्टिसे अपौरुषेय वेदादिशास्त्रोंके आधारपर कर्मका निर्णय किया है। श्रीकृष्ण एव शङ्कराचार्य-जैसे तार्किकों, दार्शनिकोंने जिसका पूर्णरूपसे समर्थन किया है, भौतिकवादियोंकी बहिर्मुख दृष्टिमें वह समझमें न आये तो क्या आश्चर्य ? सृष्टिमें ही सत्त्व, रज, तम तीनों गुणोंका क्रमेण अभि- भा-उद्भव होता रहता है। फलस्वरूप दैवी, आसुरी शक्तियाँ देश-विदेशमें समय-समयपर उद्भूत होती रहीं। दैवी शक्तिके लोग आत्मा, ईश्वर, शास्त्र तथा धर्म लेकर चलते थे और दूसरे उसके विरुद्ध। हिरण्यकशिपुने भी जैसी विधिकी व्यवस्था थी, उससे विपरीत व्यवस्था बनानेकी प्रतिज्ञा की। 'अन्यथेदं विधा- स्येऽहमयथापूर्वमोजसा ।' जर्मनीमे हीगेल, एडवर्ड आदि विचारकोने भी इस सम्बन्धमें अपना मत व्यक्त किया है।

समाज-विकास की कुंजी

'सोशलिज्म' का अर्थ है 'समाजवाद' और साम्यवादका अर्थ है समाजमें समानता लाना। समाजवादका अभिप्राय यह है कि 'समाज ही उत्पादन-साधनोंका स्वामी हो। व्यक्तिके स्थानपर समाजका शासन होना ही समाजवाद है।' फ्रांसके सेंट साइमन और इंगलैंडके राबर्टस् ओवेनने (जिनका जन्म क्रमशः १७६० और १७७१ में हुआ था) पहले-पहल साम्यवादी विचारधारा फैलायी। उनके विचार थे कि 'सरकारकी बागडोर महात्माओं एवं वैज्ञानिकोंके हाथमें होनी चाहिये।' मार्क्सवादी कहते हैं कि 'चूँकि ये विचार धार्मिक भावनाके थे, इसलिये वे लोग वास्तविकतासे परिचित न हो सके।' फ्रांसके लुई ब्ला (जिसका जन्म सन् १८११ में हुआ था) ने आधुनिक समाजवादका रूप व्यक्त किया और मजदूरोंके हाथमें राजनैतिक सत्ता देना आवश्यक समझा। फिर भी मार्क्सवादी अपने समाजवादको उन सबसे विलक्षण कहते हैं। एंजिल्सका कहना है कि 'समाज- वाद शब्दका प्रयोग अनेक बे-सिर-पैरकी हवाई आयोजनाओके लिये हुआ है। परोपकारकी भावनाओंद्वारा मजदूरोंकी अवस्था सुधारनेके ऐसे सैकड़ों प्रयत्नोंसे भी इस शब्दका सम्बन्ध रहा है जो एक तरफ मजदूरोंके कल्याणकी फिक्र करते हैं और दूसरी ओर पूँजी तथा उसके मुनाफेको भी सुरक्षित रखना चाहते हैं।' इसीलिये 'कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो' का 'समाजवादी मैनीफेस्टो' नाम नहीं रखा गया। फ्रांसके प्रौधोंने भी कहा कि 'मजदूरोंके साधनहीन होनेसे उन्हें अपने परिश्रमका पूरा फल नहीं मिलता। साधनोंसे मालिक बिना परिश्रम किये ही मजदूरोंके परिश्रमका फल हथिया लेता है।' अतः प्रौधोने 'समाजको सब सम्पत्तिका मालिक' होना ठीक समझा। इनमेंसे अनेकोंने स्त्री-पुरुषोंके सामाजिक