मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्यक्तिवाद ७५ उल्लेख है कि 'यदि मालिक और नौकरने बिना तय किये ही काम किया और कराया है तो वेतनके सम्बन्धमें विवाद उपस्थित होनेपर न्यायालयद्वारा कृषि, पशुपालनादि सम्बन्धमें लाभकी अमुक मात्रा नौकरको दिलानी चाहिये ।' हाँ, यह सब बात भले राज्यके द्वारा न होकर समाजके द्वारा हो । संसारमें रजोगुण, तमोगुणकी बहुतायत होती है । उस हालतमें 'दुर्लभो हि शुचिर्नरः' पवित्र लोग बहुत कम मिलते हैं । अतः बिना नियन्त्रणके अनेक ढंगसे शोषण चलेगा ही । शास्त्रानुसार तो बैलोंके भी कामके घण्टे नियत हैं और उनकी उच्चस्तरीय स्वस्थता- की जिम्मेदारी भी मालिकोंपर ही डाली गयी है। फिर अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मनुष्य प्राणीके सम्बन्धमें तो कहना ही क्या ? सुतरा उनके कामके घंटोंका नियम एव उचित वेतनकी व्यवस्था राज्य या सरकारद्वारा अवश्य ही होनी चाहिये । ३. जन-संख्याका नियम- जॉन माल्थसने बताया कि 'जनसंख्याकी वृद्धि ज्यामितिक ढंगसे २ से ४ (२×२) होती है और उपजकी वृद्धि अंकगणितके ढंग २ से ३ । इस नियमको भी अपरिवर्तनीय माना जाता है । अतः एक समय ऐसा आता है कि जब बढती हुई जनसंख्याके लिये देशकी उपज पर्याप्त नहीं होती । फलतः कई लोगोंको भूखा रहना पड़ता है । तब अकाल, युद्ध, भीषण बीमारियोंद्वारा जनसंख्याका घटना ही अस्थायी तौरपर समस्याका समाधान होता है ।' वस्तुतः इस तर्कद्वारा भी गरीबीको प्राकृतिक एव अनिवार्य बतलाकर राज्यके अहस्तक्षेपका ही समर्थन किया गया है । इसीलिये संतति-निरोधका भी प्रयत्न चलता है । वस्तुतः अब माल्थसका सिद्धान्त खण्डित हो गया है । उत्पादनके क्रममें घटाव, बढाव दोनो ही होते हैं । उचित उपचारो एव प्रबन्धोसे उत्पादनका विस्तार किया जा सकता है । खाद्यकी कमीके कारण मनुष्योकी संख्या घटानेका प्रयत्न अमानुषकि है । न्याय और भावनाके नाते मनुष्यकी लम्बाईके अनुसार पलंगकी लम्बाई बढानी चाहिये, न कि मनुष्यका पाँव काटकर उसे पलंगके अनुसार बनाना चाहिये । ठीक इसी तरह उत्पादन-प्रगतिद्वारा ही जनसंख्याकी समस्या हल करना उचित है । ४. पूर्ति-माँगके नियमानुसार 'पूर्ति माँगसे अधिक हो तो दाम घटता है । पूर्तिकी अपेक्षा माँग अधिक हो तो दाम बढ़ता है ।' यह नियम अवश्य ठीक है; परंतु यह भी सर्वथा अपरिवर्तनीय नहीं कहा जा सकता । उत्पादन और प्रति व्यक्तिकी आय एवं अनिवार्य आवश्यकताको ध्यानमें रखते हुए इसमें भी नियन्त्रण आवश्यक होगा । जैसे कभी माँग कम होनेपर लागत मूल्यसे भी कम दाममें वस्तु बेचनी पडती है, वैसे ही व्यक्तिसामान्यकी आय एव अनिवार्य आवश्यकताके अनुसार कई वस्तुओंका न्यूनतम, कईका अधिकतम मूल्य निर्धारण करना आवश्यक है ।