भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1003
* अध्याय २५९ *९९३

| यवो यवेन सर्वासाम् तस्यास्तस्याः प्रहीयते।<br>अङ्गुष्ठपर्वमध्यं तु तर्जन्याः सदृशं भवेत् ॥ ६८<br>यवद्वयाधिकं तद्वदग्रपर्व उदाहृतम्।<br>पर्वार्धे तु नखान् विद्यादङ्गुलीषु समन्ततः ॥ ६९<br>स्निग्धं श्लक्ष्णं प्रकुर्वीत ईषद्रक्तं तथाग्रतः।<br>निम्नपृष्ठं भवेन्मध्ये पार्श्वतः कलयोच्छ्रितम् ॥ ७०<br>तथैव केशवल्लीयं स्कन्धोपरि दशाङ्गुला।<br>स्त्रियः कार्यास्तु तन्वङ्ग्यः स्तनोरूजघनाधिकाः ॥ ७१<br>चतुर्दशाङ्गुलायाममुदरं तासु निर्दिशेत्।<br>नानाभरणसम्पन्नाः किञ्चिच्छ्लक्ष्णभुजास्ततः ॥ ७२<br>किञ्चिद् दीर्घं भवेद् वक्त्रमलकावलिरुत्तमा।<br>नासा ग्रीवा ललाटं च सार्धमात्रं त्रिरङ्गलम् ॥ ७३<br>अध्यर्धाङ्गुलविस्तारः शस्यतेऽधरपल्लवः।<br>अधिकं नेत्रयुग्मं तु चतुर्भागेन निर्दिशेत्।<br>ग्रीवाबलिश्च कर्तव्या किञ्चिदर्थाङ्गुलोच्छ्रयः ॥ ७४<br>एवं नारीषु सर्वासु देवानां प्रतिमासु च।<br>नवतालमिदं प्रोक्तं लक्षणं पापनाशनम् ॥ ७५ | मध्यभागमें दो अंगुलका अन्तर रहना चाहिये। इसी प्रकार अन्य अंगुलियोंके पोरोंमें एक-एक यवकी कमी होती जाती है। अंगूठेके पोरोंका मध्यभाग तर्जनीके समान ही रहना चाहिये। अगला पोर दो यवसे अधिक कहा गया है। अंगुलियोंके पर्वार्धमें नखोंको चिकना, सुन्दर तथा आगेकी ओर कुछ लालिमायुक्त बनाना चाहिये। मध्यभागमें पीछेकी ओर कुछ नीचा तथा बगलमें अंशमात्र ऊँचा बनावे। उसी प्रकार कंधोंके ऊपर दस अंगुलमें केशोंकी वल्लीका निर्माण करना चाहिये। स्त्री-प्रतिमाओंको कुछ पतली तथा उनके स्तन, ऊरु एवं जाँघोंको स्थूल बनाना चाहिये। उनके उदरप्रदेशकी लम्बाई चौदह अंगुल तथा वे अनेक आभूषणोंसे विभूषित हों और उनकी भुजाओंको कुछ मृदु एवं मनोहर आकृतियुक्त बनाना चाहिये। मुखाकृति अपेक्षाकृत लम्बी हो। अलकावलि उत्तम ढंगसे रचित हो। नासिका, ग्रीवा और ललाट साढ़े तीन अंगुल होने चाहिये। अधर-पल्लवोंका विस्तार आधे अंगुलका प्रशस्त माना गया है। दोनों नेत्र अधर-पल्लवोंसे चार गुने अधिक होने चाहिये। ग्रीवाकी वलि आधे अंगुलकी ऊँची बनानी चाहिये। इस प्रकार सभी देवताओंकी प्रतिमाओं एवं स्त्री-प्रतिमाओंके निर्माणमें नौ तालका परिमाण बतलाया गया है, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाला कहा गया है॥ ६१—७५॥ |

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे देवार्चानुकीर्तने प्रमाणानुकीर्तनं नामाष्टपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २५८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवपूजा-प्रसंगमें प्रतिमा-प्रमाण-कीर्तन नामक दो सौ अट्ठावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २५८॥


दो सौ उनसठवाँ अध्याय

प्रतिमाओंके लक्षण, मान, आकार आदिका कथन

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—ऋषियो! इसके बाद मैं
अतः परं प्रवक्ष्यामि देवाकारान् विशेषतः।<br>दशतालः स्मृतो रामो बलिवैरोचनिस्तथा ॥ १<br>वाराहो नारसिंहश्च सप्ततालस्तु वामनः।<br>मत्स्यकूर्मों च निर्दिष्टौ यथाशोभं स्वयम्भुवा ॥ २<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि रुद्राद्याकारमुत्तमम्।<br>स पीनोरुभुजस्कन्धस्तप्तकाञ्चनसप्रभः ॥ ३देवताओंकी मूर्तियोंके आकारके विषयमें विशेषरूपसे बतला रहा हूँ। इस विषयमें ब्रह्माने बताया है कि राम¹, विरोचनके पुत्र बलि, वाराह और नृसिंहकी मूर्तियोंकी ऊँचाई दस ताल² होनी चाहिये। वामनकी प्रतिमा सात तालकी हो तथा मत्स्य और कूर्मकी प्रतिमाएँ जितनेमें सुन्दर दीख सकें, उसी परिमाणकी बनानी चाहिये। अब मैं शिव आदिकी मूर्तियोंके आकारका वर्णन कर रहा हूँ।

१. राम शब्दसे यहाँ दशरथनन्दन राम, परशुराम तथा बलराम तीनों ही ग्राह्य हैं।
२. दस तालका तात्पर्य प्रायः पाँच हाथ या साढ़े सात फीटकी ऊँचाईसे है।