भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २३ *९१
पितृभिर्देवगन्धर्वैरोषधीभिस्तथैव च।<br>तुष्टुवुः सोमदेवत्यैर्ब्रह्माद्यैर्मन्त्रसंग्रहैः॥ ११<br>स्तूयमानस्य तस्याभूदधिको धामसम्भवः।<br>तेजोवितानादभवद् भुवि दिव्यौषधीगणः॥ १२<br>तद्धीमिरधिका तस्माद् रात्रौ भवति सर्वदा।<br>तेनौषधीशः सोमोऽभूद् द्विजेशश्चापि गद्यते॥ १३<br>वेदधामरसं चापि यदिदं चन्द्रमण्डलम्।<br>क्षीयते वर्धते चैव शुक्ले कृष्णे च सर्वदा॥ १४<br>विंशतिं च तथा सप्त दक्षः प्राचेतसो ददौ।<br>रूपलावण्यसंयुक्तास्तस्मै कन्याः सुवर्चसः॥ १५<br>ततः समाससहस्राणां सहस्राणि दशैव तु।<br>तपश्चचार शीतांशुर्विष्णुध्यानैकतत्परः॥ १६<br>ततस्तुष्टस्तु भगवान्स्तस्मै नारायणो हरिः।<br>वरं वृणीष्व प्रोवाच परमात्मा जनार्दनः॥ १७<br>ततो वव्रे वरान् सोमः शक्रलोकं जयाम्यहम्।<br>प्रत्यक्षमेव भोक्तारो भवन्तु मम मन्दिरे॥ १८<br>राजसूये सुरगणा ब्रह्माद्याः सन्तु मे द्विजाः।<br>रक्षःपालः शिवोऽस्माकमास्तां शूलधरो हरः॥ १९<br>तथेत्युक्तः स आजहे राजसूयं तु विष्णुना।<br>होतात्रिर्भृगुरध्वर्युुरुद्गाताभूच्चतुर्मुखः ॥ २०<br>ब्रह्मत्वमगमत् तस्य उपद्रष्टा हरिः स्वयम्।<br>सदस्याः सनकाद्यास्तु राजसूयविधौ स्मृताः॥ २१<br>चमसाध्वर्यवस्तत्र विश्वेदेवा दशैव तु।<br>त्रैलोक्यं दक्षिणा तेन ऋत्विग्भ्यः प्रतिपादितम्॥ २२<br>ततः समाप्तेऽवभृथे तद्रूपालोकनेच्छवः।<br>कामबाणाभितप्ताङ्ग्यो नव देव्यः सिषेविरे॥ २३<br>लक्ष्मीनारायणं त्यक्त्वा सिनीवाली च कर्दमम्।<br>द्युतिर्विभावसुं तद्वत् तुष्टिर्धातारमव्ययम्॥ २४<br>प्रभा प्रभाकरं त्यक्त्वा हविष्मन्तं कुहूः स्वयम्।<br>कीर्तिर्जयन्तं भर्तारं वसुर्मरीचकश्यपम्॥ २५उसी समय पितर, ब्रह्मादि देवता, गन्धर्व और ओषधियोंने ‘सोमदैवत्य’* नामक वैदिक मन्त्रसमूहोंसे उनकी स्तुति की। इस प्रकार स्तुति किये जानेपर चन्द्रमाका तेज और अधिक बढ़ गया। तब उस तेजसमूहसे भूतलपर दिव्य ओषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ। इसी कारण रात्रिमें उन ओषधियोंकी कान्ति सर्वदा अधिक हो जाती है। इसी हेतु चन्द्रमा ओषधीश कहलाये तथा उन्हें द्विजेश भी कहा जाता है। वेदोंके तेजरूप रससे उत्पन्न हुआ जो यह चन्द्रमण्डल है, वह सर्वदा शुक्लपक्षमें बढ़ता है और कृष्णपक्षमें क्षीण होता रहता है॥ २-१४॥<br><br>तदनन्तर प्रचेता-नन्दन दक्षने चन्द्रमाको अपनी सत्ताईस कन्याएँ—जो रूप-लावण्यसे सम्पन्न तथा परम तेजस्विनी थीं, पत्नीरूपमें प्रदान कीं। तब शीत किरणोंवाले चन्द्रमाने एकमात्र भगवान् विष्णुके ध्यानमें तत्पर होकर १० लाख वर्षोतक तपस्या की। उससे प्रभावित होकर भगवान् (ऐश्वर्यशाली) जनार्दन (दुष्टविनाशक), परमात्मा (परम आत्मबलसे सम्पन्न), नारायण (जलशायी) हैं, वे श्रीहरि चन्द्रमापर प्रसन्न हो गये और (उनके समक्ष प्रकट होकर) बोले—‘वर माँगो!’ इस प्रकार कहे जानेपर चन्द्रमाने वर माँगते हुए कहा—‘भगवन्! मैं इन्द्रलोकको जीत लेना चाहता हूँ, जिससे देवतालोग प्रत्यक्षरूपसे मेरे भवनमें आकर अपना-अपना भाग ग्रहण करें। मेरे राजसूय-यज्ञमें ब्रह्मा आदि देवगण ब्राह्मण हों तथा त्रिशूलधारी मङ्गलमय भगवान् शंकर हम सभीके दिव्य रक्षःपाल (राक्षसोंसे रक्षा करनेवाले या सभी प्रकारके रक्षक) रूपमें उपस्थित रहें।’ भगवान् विष्णुके ‘तथेति’—‘ऐसा ही हो’—यों कहकर स्वीकार कर लेनेपर चन्द्रमाने राजसूय-यज्ञका आयोजन किया। उस यज्ञमें महर्षि अत्रि होता (ऋग्वेदके पाठक), भृगु अध्वर्यु (यजुर्वेदके पाठक) और चतुर्मुख ब्रह्मा उद्गाता (सामवेदके गायक) थे। स्वयं श्रीहरिने उस यज्ञका उपद्रष्टा होकर ब्रह्मा (अथर्ववेदका पाठक)-का पद ग्रहण किया। उस राजसूय-यज्ञमें सनक आदि सदस्य और दसों विश्वेदेव चमसाध्वर्यु (यज्ञमें सोमरस पीनेवाले) बने—ऐसा सुना जाता है। उस समय चन्द्रमाने ऋत्विजोंको तीनों लोक दक्षिणारूपमें प्रदान कर दिये थे। तत्पश्चात् अवभृथस्नान (यज्ञान्तमें होनेवाला स्नान)-की समाप्तिपर (चन्द्रमाके रूपपर मुग्ध होकर) उसके सौन्दर्यका अवलोकन करनेकी इच्छासे युक्त सिनीवाली आदि नौ देवियाँ उनकी सेवामें उपस्थित हुई। लक्ष्मी नारायणको, सिनीवाली कर्दमको, द्युति विभावसुको, तुष्टि अविनाशी ब्रह्माको, प्रभा प्रभाकरको, कुहू स्वयं हविष्मान्‌को, कीर्ति जयन्तको, वसु मरीचिनन्दन कश्यपको

* ऋग्वेदके १। ९१ (मुख्यतम), ९। १-११४, १०। ८५ (जिसे विवाहसूक्त भी कहते हैं) आदि सूक्त सोमदैवत्य हैं।