मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २७८ * | १०५९ |
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| स्तूयमानो दिवः पृष्ठे पुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः।<br>विमानेनार्कवर्णेन विष्णुलोकं स गच्छति॥ २०<br>दिवि कल्पशतं तिष्ठेद् राजराजो भवेत् ततः।<br>नारायणबलोपेतो नारायणपरायणः।<br>नारायणकथासक्तो नारायणपुरं व्रजेत्॥ २१<br>यो वा पठेत् सकलकल्पतरुप्रदानं<br>यो वा शृणोति पुरुषोऽल्पधनः स्मरेद् वा।<br>सोऽपीन्द्रलोकमधिगम्य सहाप्सरोभि-<br>र्मन्वन्तरं वसति पापविमुक्तदेहः॥ २२ | वह स्वर्गलोकमें पुत्र, पौत्र और प्रपौत्रोंद्वारा स्तुति किया जाता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर विष्णुलोकको जाता है और वहाँ सौ कल्पोंतक निवास करता है। तदनन्तर वह पुनः मृत्युलोकमें राजाधिराज होता है। यहाँ वह नारायणके पराक्रमसे संयुक्त हो नारायणकी भक्तिमें निरत और उन्हींकी कथाओंमें आसक्त रहता है, जिससे पुनः वैकुण्ठलोकको प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस कल्पपादप-दानकी समग्र विधिको पढ़ता या सुनता है अथवा जो अल्पवित्तशाली पुरुष केवल स्मरण करता है, वह भी पापमुक्त होकर इन्द्रलोकमें जाकर अप्सराओंके साथ मन्वन्तरपर्यन्त निवास करता है॥ १३—२२॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने कल्पपादपप्रदानविधिर्नाम सप्तसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-अनुकीर्तन-प्रसङ्गमें कल्पपादप-प्रदान-विधि नामक दो सौ सतहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७७॥
दो सौ अठहत्तरवाँ अध्याय
गोसहस्र-दानकी विधि
| मत्स्य उवाच | |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>गोसहस्रप्रदानाख्यं सर्वपापहरं परम्॥ १<br>पुण्यां तिथिं समासाद्य युगमन्वन्तरादिकाम्।<br>पयोव्रतं त्रिरात्रं स्यादेकरात्रमथापि वा॥ २<br>लोकेशावाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानवत्।<br>पुण्याहवाचनं कुर्याद्धोमः कार्यस्तथैव च॥ ३<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्।<br>वृक्षं लक्षणसंयुक्तं वेदिमध्येऽधिवासयेत्॥ ४<br>गोसहस्रं बहिः कुर्याद् वस्त्रमाल्यविभूषणम्।<br>सुवर्णशृङ्गाभरणं रौप्यपादसमन्वितम्॥ ५<br>अन्तः प्रवेश्य दशकं वस्त्रमाल्यैश्च पूजयेत्।<br>सुवर्णघण्टिकायुक्तं कांस्यदोहनकान्वितम्॥ ६<br>सुवर्णतिलकोपेतं हेमपट्टैरलङ्कृतम्।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतं माल्यगन्धसमन्वितम्॥ ७ | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**इसके बाद मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले अत्युत्तम गोसहस्र-दान नामक महादानकी विधि बता रहा हूँ। किसी युगादि या मन्वादि पुण्य तिथिके आनेपर त्रिरात्र अथवा एकरात्र पयोव्रत करे। फिर तुलापुरुष-दानकी तरह लोकपालोंका आवाहन, पुण्याहवाचन तथा हवन करना चाहिये। पुनः उसी प्रकार ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिको भी एकत्र करे। तत्पश्चात् पूर्वनिर्दिष्ट लक्षणोंसे संयुक्त नन्दिकेश्वर (एक वृषभ)-को वेदीके मध्यभागमें स्थापित करे। वेदीके बाहर चारों ओर एक हजार गौओंको, जिनके सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों तथा जो वस्त्र और पुष्पमालासे विभूषित हों, स्थापित करे। पुनः वेदीके भीतर ऐसी दस गौओंको प्रविष्ट करे, जिनके गलेमें सोनेकी घंटी पड़ी हो, जो कांसदोहनीसे युक्त, स्वर्णमय तिलकसे सुशोभित, स्वर्णपत्रोंसे अलंकृत, रेशमी वस्त्रसे आच्छादित, पुष्पमाला और चन्दनसे |