भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०७८ * मत्स्यपुराण *


आमन्त्र्य चेत्थमभितः परिवृत्य भक्त्या<br>दद्याद् द्विजाय गुरवे जलपूर्विकां ताम्।<br>यः पुण्यमाप्य दिनमत्र कृतोपवासः<br>पापैर्विमुक्ततनुरेति पदं मुरारेः॥ १६<br><br>इति सकलविधिज्ञो रत्नधेनुप्रदानं<br>वितरति स विमानं प्राप्य देदीप्यमानम्।<br>सकलकलुषमुक्तो बन्धुभिः पुत्रपौत्रैः<br>स हि मदनस्वरूपः स्थानमभ्येति शम्भोः॥ १७इस प्रकार आमन्त्रित करनेके बाद गौकी परिक्रमा कर भक्तिपूर्वक हाथमें जल लेकर उस गौको ब्राह्मण गुरुको दान करना चाहिये। जो व्यक्ति इस प्रकार पुण्य दिन आनेपर उपवासकर यह दान करता है, उसका शरीर पापोंसे मुक्त हो जाता है और वह भगवान् मुरारिके परमपदको प्राप्त करता है। इस प्रकार सम्पूर्ण विधियोंको जाननेवाला जो पुरुष इस रत्नधेनुका दान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर कामदेव-सदृश सौन्दर्यशाली हो जाता है तथा अपने बन्धुओं, पुत्रों और पौत्रोंके साथ देदीप्यमान विमानपर सवार हो, शिवके लोक (कैलास या सुमेरुस्थित दिव्य शिवधाम)-को प्राप्त करता है॥ १२ - १७॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने रत्नधेनुप्रदानविधिर्नामाष्टाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके महादानवर्णन-प्रसङ्गमें रत्नधेनुदान नामक दो सौ अठासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८८॥


दो सौ नवासीवाँ अध्याय

महाभूतघट-दानकी विधि

मत्स्य उवाच<br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>महाभूतघटं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनादिकम्।<br>कारयेत् काञ्चनं कुम्भं महारत्नाचितं बुधः॥ ३<br>प्रादेशादङ्गलशतं यावत् कुर्यात् प्रमाणतः।<br>क्षीराज्यपूरितं तद्वत् कल्पवृक्षसमन्वितम्॥ ४<br>पद्मासनगतांस्तत्र ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान्।<br>लोकपालान् महेन्द्रांश्च स्वस्ववाहनमास्थितान्।<br>वराहेणोद्धृतां तद्वत् कुर्यात् पृथ्वीं सपङ्कजाम्॥ ५<br>वरुणं चासनगतं काञ्चनं मकरोपरि।<br>हुताशनं मेषगतं वायुं कृष्णमृगासनम्॥ ६<br>तथा कोषाधिपं कुर्यान्मूषकस्थं विनायकम्।<br>विन्यस्य घटमध्ये तान् वेदपञ्चकसंयुतान्॥ ७<br>ऋग्वेदस्याक्षसूत्रं स्याद् यजुर्वेदस्य पङ्कजम्।<br>सामवेदस्य वीणा स्याद् वेणुं दक्षिणतो न्यसेत्॥ ८मत्स्यभगवान्ने कहा—अब इसके बाद मैं महापातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम 'महाभूतघट-दान' नामक महादानकी विधि बतला रहा हूँ। किसी पवित्र तिथिके आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह पुण्याहवाचन कर ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिके प्रबन्धके साथ लोकपालोंका आवाहन आदि कार्य सम्पन्न करे। फिर बुद्धिमान् पुरुष रत्नोंसे जटित सोनेका एक कलश बनवाये, जो एक वित्तेसे लेकर सौ अंगुलतकके विस्तारवाला हो। उसे दुग्ध और घृतसे पूर्ण करके उसके पास कल्पवृक्ष रख दे। वहीं पद्मासनपर स्थित ब्रह्मा तथा अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ विष्णु, शिव, लोकपालगण, देवराज इन्द्रादि देवगणोंको भी बनाये। उसी प्रकार वराहद्वारा ऊपर उठायी गयी कमलसमेत पृथ्वीकी रचना करनी चाहिये। फिर मकरके वाहनपर आसन लगाये हुए स्वर्णनिर्मित वरुण, मेषवाहनपर आरूढ़ अग्नि, कृष्णमृगपर सवार वायु, पालकीपर बैठे हुए कुबेर तथा मूषकपर स्थित गणपति—इन सब देवताओंको पाँचों वेदोंके साथ उक्त घटमें स्थापित करना चाहिये। उनमें ऋग्वेदको रुद्राक्षमाला लिये, यजुर्वेदको कमल लिये, सामवेद-को बायें हाथमें वीणा और दाहिने हाथमें वेणु लिये