मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २६ * | १०५ |
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| शुक्र उवाच | |
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| यो ब्राह्मणोऽद्यप्रभृतीह कश्चि-<br>न्मोहात् सुरां पास्यति मन्दबुद्धिः।<br>अपेतधर्मा ब्रह्महा चैव स स्या-<br>दस्मिँल्लोके गर्हितः स्यात् परे च ॥ ६२ | शुक्राचार्यने कहा— आजसे (इस जगत्का) जो कोई भी मन्दबुद्धि ब्राह्मण अज्ञानसे भी मदिरापान करेगा, वह धर्मसे भ्रष्ट हो ब्रह्महत्याके पापका भागी होगा तथा इहलोक और परलोक—दोनोंमें निन्दित होगा। धर्मशास्त्रोंमें ब्राह्मण-धर्मकी जो सीमा निर्धारित की गयी है, उसीमें मेरे द्वारा स्थापित की हुई यह मर्यादा भी रहे और सम्पूर्ण लोकमें मान्य हो। साधु पुरुष, ब्राह्मण, गुरुओंके समीप अध्ययन करनेवाले शिष्य, देवता और समस्त जगत्के मनुष्य मेरी बाँधी हुई इस मर्यादाको अच्छी तरह सुन लें ॥ ६२-६३ ॥ |
| मया चेमां विप्रधर्मोक्तसीमां<br>मर्यादां वै स्थापितां सर्वलोके।<br>सन्तो विप्राः शुश्रुवांसो गुरूणां<br>देवा दैत्याश्चोपशृण्वन्तु सर्वे ॥ ६३ | |
| शौनक उवाच | |
| इतीदमुक्त्वा स महाप्रभाव-<br>स्ततो निधीनां निधिरप्रमेयः।<br>तान् दानवांश्चैव निगूढबुद्धी-<br>निदं समाहूय वचोऽभ्युवाच ॥ ६४ | शौनकजी कहते हैं— ऐसा कहकर तपस्याकी निधियोंकी निधि, अप्रमेय शक्तिशाली महानुभाव शुक्राचार्यने, दैवने जिनकी बुद्धिको मोहित कर दिया था, उन दानवोंको बुलाया और इस प्रकार कहा ॥ ६४ ॥ |
| शुक्र उवाच | |
| आचक्षे वो दानवा बालिशाः स्थ<br>शिष्यः कचो वत्स्यति मत्समीपे।<br>संजीवनीं प्राप्य विद्यां मयायं<br>तुल्यप्रभावो ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः ॥ ६५ | शुक्राचार्यने कहा— 'दानवो! तुम सब (बड़े) मूर्ख हो। मैं तुम्हें बताये देता हूँ—(महात्मा) कच मुझसे संजीवनी-विद्या पाकर सिद्ध हो गया है। इसका प्रभाव मेरे ही समान है। यह ब्राह्मण ब्रह्मस्वरूप है ॥ ६५ ॥ |
| शौनक उवाच | |
| गुरोरुष्य सकाशे च दशवर्षशतानि सः।<br>अनुज्ञातः कचो गन्तुमियेष त्रिदशालयम् ॥ ६६ | शौनकजी कहते हैं— कचने (इस प्रकार) एक हजार वर्षोंतक गुरुके समीप रहकर अपना व्रत पूरा कर लिया। तब (गुरुसे) घर जानेकी अनुमति मिल जानेपर उसने देवलोकमें जानेका विचार किया ॥ ६६ ॥ |
॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे सोमवंशे ययातिचरिते पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके सोम-वंश-वर्णन-प्रसंगमें ययाति-चरित नामक पचीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
छब्बीसवाँ अध्याय
देवयानीका कचसे पाणिग्रहणके लिये अनुरोध, कचकी अस्वीकृति तथा दोनोंका एक-दूसरेको शाप देना
| शौनक उवाच | शौनकजी कहते हैं— जब कचका व्रत समाप्त हो गया और गुरु (शुक्राचार्य)-ने उसे जानेकी आज्ञा दे दी, तब वह देवलोक जानेको उद्यत हुआ। उस समय देवयानीने उससे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥ |
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| समापितव्रतं तं तु विसृष्टं गुरुणा तदा।<br>प्रस्थितं त्रिदशावास देवयानीदमब्रवीत् ॥ १ |