भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 205

* अध्याय ४९ * । १९५


उनचासवाँ अध्याय

पूरू-वंशके वर्णन-प्रसङ्गमें भरत-वंशकी कथा, भरद्वाजकी उत्पत्ति और उनके वंशका कथन, नीप-वंशका वर्णन तथा पौरवोंका इतिहास

| सूत उवाच<br><br>पूरोः पुत्रो महातेजा राजा स जनमेजयः ।<br>प्राचीत्वतः सुतस्तस्य यः प्राचीमकरोद् दिशम् ॥ १<br><br>प्राचीत्वतस्य तनयो मनस्युश्च तथाभवत् ।<br>राजा वी ( पी ) तायुधो नाम मनस्योरभवत् सुतः ॥ २<br><br>दायादस्तस्य चाप्यासीद् धुन्धुर्नाम महीपतिः ।<br>धुन्धोर्बहुविधः पुत्रः संयातिस्तस्य चात्मजः ॥ ३<br><br>संयातेस्तु रहंवर्चा भद्राश्वस्तस्य चात्मजः ।<br>भद्राश्वस्य घृतायां तु दशाप्सरसि सूनवः ॥ ४<br><br>औचेयुश्च हृषेयुश्च कक्षेयुश्च सुनेयुकः ।<br>धृतेयुश्च विनेयुश्च स्थलेयुश्चैव सत्तमः ॥ ५<br><br>धर्मेयुः संनतेयुश्च पुण्येयुश्चेति ते दश ।<br>औचेयोर्ज्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा ॥ ६<br><br>तस्यां स जनयामास रन्तिनारं महीपतिम् ।<br>रन्तिनारो मनस्विन्यां पुत्राञ्जज्ञे पराञ्शुभान् ॥ ७<br><br>अमूर्तरयसं वीरं त्रिवनं चैव धार्मिकम् ।<br>गौरी कन्या तृतीया च मान्धातर्जननी शुभा ॥ ८<br><br>इलिना तु यमस्यासीत् कन्या साजनयत् सुतम् ।<br>त्रिवनाद् दयितं पुत्रमैलिनं ब्रह्मवादिनम् ॥ ९<br><br>उपदानवी सुताँल्लेभे चतुरस्त्विलिनात्मजात् ।<br>ऋष्यन्तमथ दुष्यन्तं प्रवीरमनघं तथा ॥ १०<br><br>चक्रवर्ती ततो जज्ञे दुष्यन्तात् समितिक्षयः ।<br>शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना च भारताः ॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! (ययातिके सबसे छोटे पुत्र) पूरुका पुत्र महातेजस्वी राजा जनमेजय (प्रथम) था। उसका पुत्र प्राचीत्वत (प्राचीनवंत) हुआ, जिसने प्राची (पूर्व) दिशा बसायी। प्राचीत्वतका पुत्र मनस्यु* हुआ। मनस्युका पुत्र राजा वीतायुध (अभय) हुआ। उसका पुत्र धुन्धु नामका राजा हुआ। धुन्धुका पुत्र बहुविध (बहुविद्य, अन्यत्र बहुगव) और उसका पुत्र संयाति हुआ। संयातिका पुत्र रहंवर्चा और उसका पुत्र भद्राश्व (रौद्राश्व) हुआ। भद्राश्वके घृता (घृताची, अन्यत्र मिश्रकेशी) नामकी अप्सराके गर्भसे दस पुत्र उत्पन्न हुए। उन दसोंके नाम हैं—औचेयु (अधिकांश पुराणोंमें ऋचेयु), हृषेयु, कक्षेयु, सुनेयु, धृतेयु, विनेयु, श्रेष्ठ स्थलेयु, धर्मेयु, संनतेयु और पुण्येयु। औचेयु (ऋचेयु)-की पत्नीका नाम ज्वलना था। वह नागराज तक्षककी कन्या थी। उसके गर्भसे उन्होंने भूपाल रन्तिनार (यह प्रायः सर्वत्र मतिनार, पर भागवतमें रन्तिभार है)-को जन्म दिया। रन्तिनारने अपनी पत्नी मनस्विनीके गर्भसे कई सुन्दर पुत्रोंको उत्पन्न किया, जिनमें वीरवर अमूर्तरय और धर्मात्मा त्रिवन प्रधान थे। उसकी तीसरी संतति गौरी नामकी सुन्दरी कन्या थी, जो मान्धाताकी जननी हुई। इलिना यमराजकी कन्या थी। उसने त्रिवनसे ब्रह्मवादमें श्रेष्ठ पराक्रमी ऐलिन (ऐलिक, त्रंसु या जंसु) नामक प्रिय पुत्र उत्पन्न किया। इलिना-नन्दन ऐलिन (जंसु)-के संयोगसे उपदानवीने ऋष्यन्त, दुष्यन्त, प्रवीर तथा अनघ नामक चार पुत्रोंको प्राप्त किया। इनमें द्वितीय पुत्र राजा दुष्यन्तके संयोगसे शकुन्तलाके गर्भसे भरतका जन्म हुआ, जो आगे चलकर संग्राम-विजयी चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। उसीके नामपर उसके वंशधर 'भारत' नामसे कहे जाने लगे॥ १-११॥ |


* महाभारत १।९४।१ तथा अन्य वायु, विष्णु, ब्रह्माण्डादि पुराणोंमें प्राचीनवंत या प्राचीनवंशका पुत्र प्रवीर और उसका पुत्र मनस्यु कहा गया है। इसमें आगे भी जहाँ-तहाँ कुछ पुरुष छोड़ दिये गये हैं जो पढ़ते समय स्पष्ट ज्ञात हो जाता है।