भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०४* मत्स्यपुराण *

| शांतनुस्त्वभवद् राजा विद्वान् स वै महाभिषक्।<br>इदं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं प्रति महाभिषम्॥ ४२<br>यं यं कराभ्यां स्पृशति जीर्णं रोगिणमेव च।<br>पुनर्युवा स भवति तस्मात् तं शांतनुं विदुः॥ ४३<br>तत् तस्य शांतनुत्वं हि प्रजाभिरिह कीर्त्यते।<br>ततोऽवृणुत भार्यार्थं शांतनुर्जाह्नवीं नृपः॥ ४४<br>तस्यां देवव्रतं नाम कुमारं जनयद् विभुः।<br>काली विचित्रवीर्यं तु दाशेयी जनयत् सुतम्॥ ४५<br>शांतनोर्दयितं पुत्रं शान्तात्मानमकल्मषम्।<br>कृष्णद्वैपायनो नाम क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके॥ ४६<br>धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्यजीजनत्।<br>धृतराष्ट्रस्तु गान्धार्यां पुत्रानजनयच्छतम्॥ ४७<br>तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वक्षत्रस्य वै प्रभुः।<br>माद्री कुन्ती तथा चैव पाण्डोर्भार्ये बभूवतुः॥ ४८<br>देवदत्ताः सुताः पञ्च पाण्डोरर्थेऽभिजज्ञिरे।<br>धर्माद् युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः॥ ४९<br>इन्द्राद् धनञ्जयश्चैव इन्द्रतुल्यपराक्रमः।<br>नकुलं सहदेवं च माद्र्यश्विभ्यामजीजनत्॥ ५०<br>पञ्चैते पाण्डवेभ्यस्तु द्रौपद्यां जज्ञिरे सुताः।<br>द्रौपद्यजनयच्छ्रेष्ठं प्रतिविन्ध्यं युधिष्ठिरात्॥ ५१<br>श्रुतसेनं भीमसेनाच्छ्रुतकीर्तिं धनञ्जयात्।<br>चतुर्थं श्रुतकर्मार्णं सहदेवादजायत॥ ५२<br>नकुलाच्च शतानीकं द्रौपदेयाः प्रकीर्तिताः।<br>तेभ्योऽपरे पाण्डवेयाः षडेवान्ये महारथाः॥ ५३<br>हैडम्बो भीमसेनात् तु पुत्रो जज्ञे घटोत्कचः।<br>काशी बलधराद् भीमाज्जज्ञे वै सर्वगं सुतम्॥ ५४<br>सुहोत्रं तनयं माद्री सहदेवादसूत।<br>करेणुमत्यां चैद्यायां निरमित्रस्तु नाकुलिः॥ ५५ | (देवापिके वन चले जानेपर) शांतनु राजा हुए। ये विद्वान् तो थे ही, साथ ही महान् वैद्य भी थे। इनकी महावैद्यताके प्रति लोग एक श्लोक कहा करते हैं, जिसका आशय यह है कि 'महाराज शांतनु जिस-जिस रोगी अथवा वृद्धको अपने हाथोंसे स्पर्श कर लेते थे, वह पुनः नौजवान हो जाता था। इसी कारण लोग उन्हें शांतनु कहते थे।' उस समय प्रजागण उनके इस शांतनुत्व (रोगी और वृद्धको युवा बना देनेवाले) गुणका ही वर्णन करते थे। तदनन्तर प्रभावशाली राजा शांतनुने जह्नु-नन्दिनी गङ्गाको अपनी पत्नीके रूपमें वरण किया और उनके गर्भसे देवव्रत (भीष्म) नामक कुमारको पैदा किया। दाश-कन्या काली सत्यवतीने शांतनुके संयोगसे विचित्रवीर्य नामक पुत्रको जन्म दिया, जो पिताके लिये परम प्रिय, शान्तात्मा और निष्पाप था। महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यासने विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें धृतराष्ट्र और पाण्डुको तथा (दासीसे) विदुरको उत्पन्न किया था। धृतराष्ट्रने गान्धारीके गर्भसे सौ पुत्रोंको उत्पन्न किया, उनमें दुर्योधन सबसे श्रेष्ठ था और वह सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंशका स्वामी था। इसी प्रकार पाण्डुकी कुन्ती और माद्री नामकी दो पत्नियाँ हुईं। इन्हीं दोनोंके गर्भसे महाराज पाण्डुकी वंश-वृद्धिके लिये देवताओंद्वारा प्रदान किये गये पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। कुन्तीने धर्मके संयोगसे युधिष्ठिरको, वायुके संयोगसे वृकोदर (भीमसेन)-को और इन्द्रके संयोगसे इन्द्रसरीखे पराक्रमी धनञ्जय (अर्जुन)-को जन्म दिया। इसी प्रकार माद्रीने अश्विनीकुमारोंके संयोगसे नकुल और सहदेवको पैदा किया॥ ४१-५०॥<br><br>इन पाँचों पाण्डवोंके संयोगसे द्रौपदीके गर्भसे पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें द्रौपदीने युधिष्ठिरके संयोगसे ज्येष्ठ पुत्र प्रतिविन्ध्यको, भीमसेनके संयोगसे श्रुतसेनको और अर्जुनके संयोगसे श्रुतकीर्तिको जन्म दिया था। चौथा पुत्र श्रुतकर्मार् सहदेवसे और शतानीक नकुलसे उत्पन्न किया था। ये पाँचों द्रौपदेय अर्थात् द्रौपदीके पुत्र कहलाये। इनके अतिरिक्त पाण्डवोंके छः अन्य महारथी पुत्र भी थे। (उनका विवरण इस प्रकार है—) भीमसेनके संयोगसे हिडिम्बा नामकी राक्षसीके गर्भसे घटोत्कच नामक पुत्रका जन्म हुआ था। उनकी दूसरी पत्नी काशीने बलवान् भीमसेनके संयोगसे सर्वग नामक पुत्रको जन्म दिया था। मद्रराज-कुमारी सहदेव-पत्नीने सहदेवके संयोगसे सुहोत्र नामक पुत्रको पैदा किया था। नकुल-पुत्र निरमित्र चेदिराज-कुमारी करेणुमतीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था। |