मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २० | * मत्स्यपुराण * |
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| ततः पुलहनामा वै ततः क्रतुरजायत ।<br>प्रचेताश्च ततः पुत्रो वसिष्ठश्चाभवत् पुनः ॥ ७<br>पुत्रो भृगुरभूत् तद्वन्नारदोऽप्यचिरादभूत् ।<br>दशेमान् मानसान् ब्रह्मा मुनीन् पुत्रानजीजनत् ॥ ८<br>शारीरानथ वक्ष्यामि मातृहीनान् प्रजापतेः ।<br>अङ्गुष्ठाद् दक्षिणाद् दक्षः प्रजापतिरजायत ॥ ९<br>धर्मः स्तनान्तादभवद्धृदयात् कुसुमायुधः ।<br>भ्रूमध्यादभवत् क्रोधो लोभश्चाधरसम्भवः ॥ १०<br>बुद्धेर्मोहः समभवदहंकारादभून्मदः ।<br>प्रमोदश्चाभवत् कण्ठान्मृत्युर्लोचनतो नृप ॥ ११<br>भरतः करमध्यात्तु ब्रह्मसूनुरभूत्ततः ।<br>एते नव सुता राजन् कन्या च दशमी पुनः ।<br>अङ्गजा इति विख्याता दशमी ब्रह्मणः सुता ॥ १२ | तदनन्तर पुलह और तत्पश्चात् क्रतु उत्पन्न हुए। उसके बाद प्रचेता नामक पुत्र हुए। पुनः वसिष्ठजीका जन्म हुआ। तत्पश्चात् भृगु पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए तथा शीघ्र ही नारदका भी आविर्भाव हुआ। इन्हीं दस पुत्रोंको ब्रह्माने अपने मनसे उत्पन्न किया, जो सभी मुनि-रूपसे विख्यात हुए। राजन्! अब मैं ब्रह्माके शरीरसे उत्पन्न हुए मातृ-विहीन पुत्रोंका वर्णन करता हूँ। प्रजापति ब्रह्माके दाहिने अँगूठेसे दक्ष प्रजापति प्रकट हुए। उनके स्तनान्तभागसे धर्म और हृदयसे कुसुमायुध (कामदेव)-का जन्म हुआ। भ्रूमध्यसे क्रोध और होंठसे लोभकी उत्पत्ति हुई। बुद्धिसे मोहका तथा अहंकारसे मदका जन्म हुआ। कण्ठसे प्रमोद और नेत्रोंसे मृत्युकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् हथेलीसे ब्रह्मपुत्र भरत* प्रकट हुए। राजन्! ये नौ पुत्र ब्रह्माके शरीरसे प्रकट हुए हैं। ब्रह्माकी दसवीं संतान (एक) कन्या है, जो अङ्गजा नामसे विख्यात हुई॥ २—१२॥ | | <div align="center">मनुरुवाच</div>बुद्धेर्मोहः समभवदिति यत् परिकीर्तितम् ।<br>अहंकारः स्मृतः क्रोधो बुद्धिर्नाम किमुच्यते ॥ १३ | **मनुने पूछा—**भगवन्! आपने जो यह बतलाया कि बुद्धिसे मोहकी उत्पत्ति हुई और (इसी प्रसङ्गमें) अहंकार, क्रोध एवं बुद्धिका भी नाम लिया, सो ये सब क्या हैं? (इनपर प्रकाश डालिये)॥ १३॥ | | <div align="center">मत्स्य उवाच</div>सत्त्वं रजस्तमश्चैव गुणत्रयमुदाहृतम् ।<br>साम्यावस्थितिरेतेषां प्रकृतिः परिकीर्तिता ॥ १४<br>केचित् प्रधानमित्याहुरव्यक्तमपरे जगुः ।<br>एतदेव प्रजासृष्टिं करोति विकरोति च ॥ १५<br>गुणेभ्यः क्षोभमाणेभ्यस्त्रयो देवा विजज्ञिरे ।<br>एका मूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ १६<br>सविकारात् प्रधानात्तु महत्तत्त्वं प्रजायते ।<br>महानिति यतः ख्यातिर्लोकानां जायते सदा ॥ १७<br>अहंकारश्च महतो जायते मानवर्धनः ।<br>इन्द्रियाणि ततः पञ्च वक्ष्ये बुद्धिवशानि तु ।<br>प्रादुर्भवन्ति चान्यानि तथा कर्मवशानि तु ॥ १८ | **मत्स्यभगवान् कहने लगे—**राजर्षे! सत्त्व, रजस् और तमस्—जो ये तीनों गुण बतलाये गये हैं, इनकी साम्यावस्थाको प्रकृति कहा जाता है। कुछ लोग इसे प्रधान कहते हैं। दूसरे लोग इसे अव्यक्त नामसे भी निर्देश करते हैं। यही प्रकृति प्रजाकी सृष्टि करती है और (यही सृष्टिको) बिगाड़ती भी है। इन्हीं तीनों गुणोंके क्षुब्ध होनेपर इनसे तीन देवता उत्पन्न होते हैं। इन (तीनों देवों)-की मूर्ति तो एक ही है, परंतु वह ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर—इन तीन देवताओंके रूपमें विभक्त हो जाती है। तदनन्तर प्रधानके विकृत होनेपर उससे महत्तत्त्वकी उत्पत्ति होती है, जिससे लोकोंके मध्यमें उसकी सदा 'महान्' रूपसे ख्याति होती है। उस महत्तत्त्वसे मानको बढ़ानेवाला अहंकार प्रकट होता है। उस अहंकारसे दस इन्द्रियाँ आविर्भूत होती हैं, जिनमें पाँच बुद्धि (ज्ञान)-के वशीभूत रहती हैं और दूसरी पाँच कर्मके अधीन रहती हैं। |
* भारतमें भरत नामके कई प्रसिद्ध व्यक्ति हुए हैं। ये भरतमुनि हैं, जो 'नाट्यवेद' या 'भरतनाट्यम्' के प्रवर्तक माने जाते हैं।