मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २१० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्वस्माद् देवलोकाच्च हव्यं कव्यं भुनक्ति यः।<br>पुत्रोऽस्य स हितो ह्यग्निरद्भुतः स महायशाः॥ ३५<br>प्रायश्चित्तेष्वभीमानी हुतं हव्यं भुनक्ति यः।<br>अद्भुतस्य सुतो वीरो देवांशस्तु महान् स्मृतः॥ ३६<br>विविधाग्निस्ततस्तस्य तस्य पुत्रो महाकविः।<br>विविधाग्निसुतादर्कादग्नयोऽष्टौ सुताः स्मृताः॥ ३७ | दहनके पुत्र अद्भुत नामक अग्नि हैं, जो समस्त देवलोकोंमें दिये गये हव्य एवं कव्यका भक्षण करते हैं। वे महान् यशस्वी और जनताके हितकारी हैं। ये प्रायश्चित्तनिमित्तक यज्ञोंके अभिमानी देवता हैं, इसी कारण उन यज्ञोंमें हवन किये गये हव्यको खाते हैं। अद्भुतके पुत्र वीर नामक अग्नि हैं, जो देवांशसे उद्भूत और महान् कहे जाते हैं। उनके पुत्र विविधाग्नि हैं और विविधाग्निके पुत्र महाकवि हैं। विविधाग्निके दूसरे पुत्र अर्कसे आठ अग्नि-पुत्रोंकी उत्पत्ति बतलायी जाती है॥ २४—३७॥ |
| काम्यास्विष्टिष्वभीमानी रक्षोहा यतिकृच्च यः।<br>सुरभिर्वसुमान् नादो हर्यश्वश्चैव रुक्मवान्॥ ३८<br>प्रवर्ग्यः क्षेमवांश्चैव इत्यष्टौ च प्रकीर्तिताः।<br>शुच्यग्रेस्तु प्रजा ह्येषा अग्नयश्च चतुर्दश॥ ३९<br>इत्येते ह्यग्नयः प्रोक्ताः प्रणीता ये हि चाध्वरे।<br>समतीते तु सर्गे ये यामैः सह सुरोत्तमैः॥ ४०<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वमग्नयस्तेऽभिमानिनः।<br>एते विहरणीयेषु चेतनाचेतनेष्विह॥ ४१<br>स्थानाभिमानिनोऽग्नीध्राः प्रागासन् हव्यवाहनाः।<br>काम्यनैमित्तिकाद्यास्ते ये ते कर्मस्ववस्थिताः॥ ४२<br>पूर्वे मन्वन्तरेऽतीते शुक्लैर्यामैश्च तैः सह।<br>एते देवगणैः सार्धं प्रथमस्यान्तरे मनोः॥ ४३<br>इत्येता योनयो ह्युक्ताः स्थानाख्या जातवेदसाम्।<br>स्वारोचिषादिषु ज्ञेयाः सवर्णान्तेषु सप्तसु॥ ४४<br>तैरेवं तु प्रसंख्यातं साम्प्रतानागतेष्विह।<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु लक्षणं जातवेदसाम्॥ ४५<br>मन्वन्तरेषु सर्वेषु नानारूपप्रयोजनैः।<br>वर्तन्ते वर्तमानैश्च यामैर्देवैः सहाग्नयः॥ ४६<br>अनागतैः सुरैः सार्धं वत्स्यन्तोऽनागतास्त्वथ।<br>इत्येष प्रचयोऽग्नीनां मया प्रोक्तो यथाक्रमम्।<br>विस्तरेणानुपूर्व्या च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ॥ ४७ | कामना-पूर्तिके निमित्त किये जानेवाले यज्ञोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका नाम रक्षोहा अग्नि है। उनका दूसरा नाम यतिकृत् भी है। इनके अतिरिक्त सुरभि, वसुरत्न, नाद, हर्यश्व, रुक्मवान्, प्रवर्ग्य और क्षेमवान्—ये आठ अग्नि कहे गये हैं। ये सभी शुचि नामक अग्निकी संतान हैं। इन सबकी संख्या चौदह है। इस प्रकार मैंने उन सभी अग्नियोंका वर्णन कर दिया, जिनका यज्ञ-कार्यमें प्रयोग किया जाता है। प्रलयकालमें ये सभी अग्निपुत्र याम नामक श्रेष्ठ देवताओंके साथ स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सभी चेतन एवं अचेतन विहरणीय पदार्थोंके अभिमानी देवता थे। इस पूर्व मन्वन्तरके समाप्त हो जानेपर पुनः प्रथम मन्वन्तरमें ये सभी अग्निगण शुक्र एवं याम नामक देवगणोंके साथ स्थानाभिमानी देवता बनकर अग्नीध्र नामक अग्निके साथ हव्य-वहनका कार्य करते थे और काम्य एवं नैमित्तिक आदि जो यज्ञ किये जाते थे, उन कर्मोंमें अवस्थित रहते थे। इस प्रकार मैंने अग्नियोंकी स्थानाम्नी योनियोंका वर्णन कर दिया। उन्हें स्वारोचिष् मन्वन्तरसे लेकर सावर्णि मन्वन्तरतकके सातों लोकोंमें वर्तमान जानना चाहिये। ऋषियोंने वर्तमान एवं भविष्यमें आनेवाली सभी मन्वन्तरोंमें इसी प्रकार अग्नियोंके लक्षणका वर्णन किया है। ये सभी अग्नि समस्त मन्वन्तरोंमें नाना प्रकारके रूप और प्रयोजनोंसे समन्वित हो वर्तमानकालीन याम नामक देवताओंके साथ वर्तमान थे और इस समय भी हैं तथा भविष्यमें भी उत्पन्न होकर इन नये उत्पन्न होनेवाले देवगणोंके साथ निवास करेंगे। इस प्रकार मैं अग्नियोंके वंश-समूहका क्रमशः विस्तारपूर्वक आनुपूर्वी वर्णन कर चुका। अब आपलोग और क्या सुनना चाहते हैं?॥ ३८—४७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽग्निवंशो नामैकपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अग्निवंश-वर्णन नामक इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५१॥