मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय ५३ * २१९
| विषुवे हेममत्स्येन धेन्वा चैव समन्वितम्।<br>यो दद्यात् पृथिवी तेन दत्ता भवति चाखिला॥ ५१<br><br>यदा च गारुडे कल्पे विश्वाण्डाद् गरुडोद्भवम्।<br>अधिकृत्याब्रवीत् कृष्णो गारुडं तदिहोच्यते॥ ५२<br><br>तदष्टादशकं चैकं सहस्त्राणीह पठ्यते।<br>सौवर्णहंससंयुक्तं यो ददाति पुमानिह।<br>स सिद्धिं लभते मुख्यां शिवलोके च संस्थितिम्॥ ५३<br><br>ब्रह्मा ब्रह्माण्डमाहात्म्यमधिकृत्याब्रवीत् पुनः।<br>तच्च द्वादशसाहस्त्रं ब्रह्माण्डं द्विशताधिकम्॥ ५४<br><br>भविष्याणां च कल्पानां श्रूयते यत्र विस्तरः।<br>तद् ब्रह्माण्डपुराणं च ब्रह्मणा समुदाहृतम्॥ ५५<br><br>यो दद्यात् तद् व्यतीपाते पीतोर्णायुगसंयुतम्।<br>राजसूयसहस्त्रस्य फलमाप्नोति मानवः।<br>हेमधेन्वा युतं तच्च ब्रह्मलोकफलप्रदम्॥ ५६<br><br>चतुर्लक्षमिदं प्रोक्तं व्यासेनाद्भुतकर्मणा।<br>मत्पितुर्मम पित्रा च मया तुभ्यं निवेदितम्॥ ५७<br><br>इह लोकहितार्थाय संक्षिप्तं परमर्षिणा।<br>इदमद्यापि देवेषु शतकोटिप्रविस्तरम्॥ ५८<br><br>उपभेदान् प्रवक्ष्यामि लोके ये सम्प्रतिष्ठिताः।<br>पाद्मे पुराणे यत्रोक्तं नरसिंहोपवर्णनम्।<br>तच्चाष्टादशसाहस्त्रं नारसिंहमिहोच्यते॥ ५९<br><br>नन्दाया यत्र माहात्म्यं कार्त्तिकेयेन वर्ण्यते।<br>नन्दीपुराणं तल्लोकैराख्यातमिति कीर्त्यते॥ ६० | जो मनुष्य विषुवयोग (मेष अथवा तुलाकी संक्रान्ति)-में स्वर्णनिर्मित मत्स्य और दुधारू गौके साथ इस पुराणका दान करता है, उसके द्वारा समग्र पृथ्वीका दान सम्पन्न हो जाता है अर्थात् उसे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त होता है। जिसमें भगवान् श्रीकृष्णने गरुड-कल्पके समय विश्वाण्ड (ब्रह्माण्ड)-से गरुडकी उत्पत्तिके वृत्तान्तका आश्रय लेकर उपदेश दिया है, उसे इस लोकमें सप्तदश गारुड (गरुडपुराण) कहते हैं। उसे भूतलपर उन्नीस हजार श्लोकोंका कहा जाता है। जो पुरुष स्वर्णनिर्मित हंसके साथ इस पुराणका दान करता है, उसे मुख्य सिद्धि प्राप्त होती है और वह शिवलोकमें निवास करता है। जिसमें ब्रह्माने पुनः ब्रह्माण्डके माहात्म्यका आश्रय लेकर वृत्तान्तोंका वर्णन किया है तथा जिसमें भविष्यकल्पोंका भी विस्तारपूर्वक वर्णन सुना जाता है, उसे ब्रह्माने (अन्तिम—अष्टादश) ब्रह्माण्डपुराण बतलाया है<sup>१</sup>। वह ब्रह्माण्डपुराण बारह हजार दो सौ श्लोकोंवाला है। जो मानव व्यतीपात नामक योगमें पीले रंगके दो ऊनी वस्त्रोंके साथ इस पुराणका दान करता है, उसे एक हजार राजसूय-यज्ञके<sup>२</sup> फलकी प्राप्ति होती है। उसी (ब्रह्माण्डपुराण)-को यदि स्वर्णनिर्मित गौके साथ दान किया जाय तो वह ब्रह्मलोक-प्राप्तिरूपी फलका प्रदाता बन जाता है। अद्भुतकर्मा महर्षि वेदव्यासने मेरे पिता रोमहर्षणके प्रति इन चार लाख श्लोकोंका वर्णन किया था। उसीको मेरे पिताने मुझे बतलाया और मैंने आपलोगोंके प्रति निवेदन कर दिया। परमर्षि व्यासजीने मृत्युलोकमें लोकहितके लिये इसका संक्षेप कर दिया है, किंतु देवलोकमें तो यह आज भी सौ करोड़ श्लोकोंसे युक्त ही है॥ ४९—५८॥<br><br>ऋषियो! अब मैं उन उपपुराणोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें प्रचलित हैं। पद्मपुराणमें जहाँ नृसिंहावतारके वृत्तान्तका वर्णन किया गया है, उसे नारसिंह (नरसिंहपुराण<sup>३</sup>) कहते हैं। उसमें अठारह हजार श्लोक हैं। जिसमें स्वामिकार्तिकने नन्दाके माहात्म्यका वर्णन किया है, उसे लोग नन्दीपुराणके नामसे पुकारते हैं। |
१. यह पुराण प्रायः सर्वांशमें वायुपुराणसे (और अत्यधिक अंशोंमें मत्स्यपुराणसे भी) मिल जाता है, यह एक विचित्र बात है। केवल अन्तमें उसके गयामाहात्म्यकी जगह इसमें ललितोपाख्यान है।
२. यह भी अश्वमेधवत् प्रसिद्ध तथा श्रौतसूत्रोंमें प्रायः उन्हीं स्थलोंपर चर्चित है।
३. कल्याण वर्ष ४५ में यह मूलसहित और सानुवाद प्रकाशित है और अब ग्रन्थरूपमें पुनर्मुद्रित हो चुका है।