भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२२८ * मत्स्यपुराण *

| भक्ताय दान्ताय च गुह्यमेत-<br>दाख्येयमानन्दकरं शिवस्य।<br>इदं महापातकभिन्Doc/कराणा-<br>मप्यक्षरं वेदविदो वदन्ति॥ ३०<br>न बन्धुपुत्रेण धनैर्वियुक्तः<br>पत्नीभिरानन्दकरः सुराणाम्।<br>नाभ्येति रोगं न च शोकदुःखं<br>या वाथ नारी कुरुतेऽतिभक्त्या॥ ३१<br>इदं वसिष्ठेन पुरार्जुनेन<br>कृतं कुबेरेण पुरन्दरेण।<br>यत्कीर्त्तनेनाप्यखिलानि नाश-<br>मायान्ति पापानि न संशयोऽस्ति॥ ३२<br>इति पठति शृणोति वा य इत्थं<br>रविशयनं पुरुहूतवल्लभः स्यात्।<br>अपि नरकगतान् पितॄनशेषा-<br>नपि दिवमानयतीह यः करोति॥ ३३ | भगवान्के भक्त और जितेन्द्रिय पुरुषके समक्ष ही शिवजीका यह आनन्ददायी एवं गूढ़ रहस्य प्रकाशित करनेके योग्य है। वेदवेत्ता पुरुषोंका कहना है कि यह व्रत महापातकी मनुष्योंके भी पापोंका नाश कर देता है। जो पुरुष इस व्रतका अनुष्ठान करता है, उसका बन्धु, पुत्र, धन और स्त्रीसे कभी वियोग नहीं होता तथा वह देवताओंका आनन्द बढ़ानेवाला माना जाता है। इसी प्रकार जो नारी भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करती है उसे कभी रोग, दुःख और शोकका शिकार नहीं होना पड़ता। प्राचीनकालमें महर्षि वसिष्ठ, अर्जुन, कुबेर तथा इन्द्रने इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके कीर्तनमात्रसे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो पुरुष इस आदित्यशयन नामक व्रतके माहात्म्य एवं विधिको पाठ या श्रवण करता है, वह इन्द्रका प्रियतम होता है तथा जो इस व्रतका अनुष्ठान करता है, वह नरकमें भी पड़े हुए समस्त पितरोंको स्वर्गलोकमें पहुँचा देता है॥ २९—३३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे आदित्यशयनव्रतं नाम पञ्चपञ्चाशोऽध्यायः॥ ५५॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें आदित्यशयनव्रत नामक पचपनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ५५॥


छप्पनवाँ अध्याय

श्रीकृष्णाष्टमी-*व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

श्रीभगवानुवाचश्रीभगवान्ने कहा—नारद! अब मैं श्रीकृष्णाष्टमी-
कृष्णाष्टमीमथो वक्ष्ये सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>शान्तिर्मुक्तिश्च भवति जयः पुंसां विशेषतः॥ १व्रतका वर्णन कर रहा हूँ, जो समस्त पापोंका विध्वंस करनेवाला है। इस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्योंको विशेषरूपसे शान्ति, मुक्ति और विजयकी प्राप्ति होती है।
शङ्करं मार्गशिरसि शम्भुं पौषेऽभिपूजयेत्।<br>माघे महेश्वरं देवं महादेवं च फाल्गुने॥ २मनुष्यको अगहनमासमें शङ्करकी और पौषमासमें शम्भुकी पूजा करनी चाहिये। माघमासमें देवाधिदेव महेश्वरका, फाल्गुनमासमें महादेवका, चैत्रमासमें स्थाणुका, और उसी
स्थाणुं चैत्रे शिवं तद्वद् वैशाखे त्वर्चयेन्नरः।<br>ज्येष्ठे पशुपतिं चार्चेदाषाढे उग्रमर्चयेत्॥ ३प्रकार वैशाखमासमें शिवका पूजन करना उचित है। ज्येष्ठ-मासमें पशुपतिकी और आषाढ़मासमें उग्रकी अर्चना करे।

* यह श्रीकृष्ण-जन्माष्टमीसे भिन्न शिवोपासनाका एक मुख्य अङ्गभूत व्रत है। इसकी महिमा तथा अनुष्ठानविधिका वर्णन भविष्य, नारद, सौरपुराण १४। १—३६, व्रतकल्पद्रुम आदिमें बहुत विस्तारसे है। विशेष जानकारीके लिये उन्हें भी देखना चाहिये।

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