मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २३० | * मत्स्यपुराण * |
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सत्तावनवाँ अध्याय
रोहिणीचन्द्रशयन-व्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नारद उवाच<br>दीर्घायुरारोग्यकुलाभिवृद्धि-<br>युक्तः पुमान् भूपकुलान्वितः स्यात्।<br>मुहुर्मुहुर्जन्मनि येन सम्यग्<br>व्रतं समाचक्ष्व तदिन्दुमौले ॥ १ | **नारदजीने पूछा—**चन्द्रभाल! जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य प्रत्येक जन्ममें दीर्घायु, नीरोगता, कुलीनता और अभ्युदयसे युक्त हो राजाके कुलमें जन्म पाता है, उस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>त्वया पृष्टमिदं सम्यगुक्तं चाक्षय्यकारकम्।<br>रहस्यं तव वक्ष्यामि यत्पुराणविदो विदुः ॥ २ | **श्रीभगवान्ने कहा—**नारद! तुमने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं तुम्हें वह गोपनीय व्रत बतलाता हूँ, जो अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है तथा जिसे पुराणवेत्ता विद्वान् ही जानते हैं। |
| रोहिणीचन्द्रशयनं नाम व्रतमिहोत्तमम्।<br>तस्मिन् नारायणस्यार्चामर्चयेदिन्दुनामभिः॥ ३ | इस लोकमें 'रोहिणीचन्द्रशयन' नामक व्रत बड़ा ही उत्तम है। इसमें चन्द्रमाके नामोंद्वारा भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। |
| यदा सोमदिने शुक्ला भवेत् पञ्चदशी क्वचित्।<br>अथवा ब्रह्मणक्षत्रं पौर्णमास्यां प्रजायते ॥ ४ | जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा-तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणीनक्षत्र हो, |
| तदा स्नानं नरः कुर्यात् पञ्चगव्येन सर्षपैः।<br>आप्यायस्वेति च जपेद् विद्वानष्ट शतं पुनः॥ ५ | उस दिन मनुष्य सबेरे पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष 'आप्यायस्व०' इत्यादि मन्त्रको एक सौ आठ बार जपे। |
| शूद्रोऽपि परया भक्त्या पाखण्डालापवर्जितः।<br>सोमाय वरदायाथ विष्णवे च नमो नमः॥ ६ | यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियों—विधर्मियोंसे बातचीत न करे। |
| कृतजप्यः स्वभवनमागत्य मधुसूदनम्।<br>पूजयेत् फलपुष्पैश्च सोमनामानि कीर्तयन्॥ ७ | जप करनेके पश्चात् अपने घर आकर फल-फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे। |
| सोमाय शान्ताय नमोऽस्तुपादा-<br>वनन्तधाम्नेति च जानुजङ्घे।<br>ऊरुद्वयं चापि जलोदराय<br>सम्पूजयेन्मेढ्रमनन्तबाहोः ॥ ८ | 'सोमाय नमः' से भगवान्के दक्षिण चरण और 'शान्ताय नमः' से वाम चरणका, 'अनन्तधाम्ने नमः' का उच्चारण करके उनके घुटनों और पिंडलियोंका, 'जलोदराय नमः' से दोनों जाँघोंका और 'अनन्तबाहवे नमः' से जननेन्द्रियका पूजन करे। |
| नमो नमः कामसुखप्रदाय<br>कटिः शशाङ्कस्य सदार्चनीया।<br>अथोदरं चाप्यमृतोदराय<br>नाभिः शशाङ्काय नमोऽभिपूज्या॥ ९ | 'कामसुखप्रदाय नमो नमः' से चन्द्रस्वरूप भगवान्के कटिभागकी सदा अर्चना करनी चाहिये। इसी प्रकार 'अमृतोदराय नमः' से उदरका और 'शशाङ्काय नमः' से नाभिका पूजन करे। |
| नमोऽस्तु चन्द्राय प्रपूज्य कण्ठं<br>दन्ता द्विजानामधिपाय पूज्याः।<br>आस्यं नमश्चन्द्रमसेऽभिपूज्य-<br>मोष्ठौ कुमुद्वन्तवनप्रियाय ॥ १० | 'चन्द्राय नमोऽस्तु' से कण्ठका और 'द्विजानामधिपाय नमः' से दाँतोंका पूजन करना चाहिये। 'चन्द्रमसे नमः' से मुँहका पूजन करे। 'कुमुद्वन्तवनप्रियाय नमः' से |