भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 270
२६०* मत्स्यपुराण *

सड़सठवाँ अध्याय

सूर्य-चन्द्र-ग्रहणके समय स्नानकी विधि और उसका माहात्म्य

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मनुरुवाच<br>चन्द्रादित्योपरागे तु यत् स्नानमभिधीयते।<br>तदहं श्रोतुमिच्छामि द्रव्यमन्त्रविधानवित्॥ १**मनुने पूछा—**द्रव्य और मन्त्रोंकी विधियोंके ज्ञाता (पूर्ण वेदविद्) भगवन्! सूर्य एवं चन्द्रके ग्रहणके अवसरपर स्नानकी जैसी विधि बतलायी गयी है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ॥ १॥
मत्स्य उवाच<br>यस्य राशिं समासाद्य भवेद् ग्रहणसम्प्लवः।<br>तस्य स्नानं प्रवक्ष्यामि मन्त्रौषधविधानतः॥ २<br>चन्द्रोपरागं सम्प्राप्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>सम्पूज्य चतुरो विप्रान् शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ ३<br>पूर्वमेवोपरागस्य समासाद्यौषधादिकम्।<br>स्थापयेच्चतुरः कुम्भानव्रणान् सागरानिति॥ ४मत्स्यभगवान्‌ने कहा—(राजन्!) जिस पुरुषकी राशिपर ग्रहणका प्लावन (लगना) होता है, उसके लिये मन्त्र और औषधके विधानपूर्वक स्नान बतला रहा हूँ। ऐसे मनुष्यको चाहिये कि चन्द्र-ग्रहणके अवसरपर चार ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराकर श्वेत पुष्प और चन्दन आदिसे उनकी पूजा करे। ग्रहणके पूर्व ही औषध आदिको एकत्र कर ले। फिर छिद्ररहित चार कलशोंकी, उनमें समुद्रकी भावना करके स्थापना करे। फिर उनमें
गजाश्वरथ्यावल्मीकसंगमाद्दहदगोकुलात् ।<br>राजद्वारप्रदेशाच्च मृदानीय चाक्षिपेत्॥ ५सप्तमृत्तिका—हाथीसार, घुड़शाल, वल्मीक (बल्मोट-दियाँड़), नदीके संगम, सरोवर, गोशाला और राजद्वारसे मिट्टी लाकर डाल दे।
पञ्चगव्यं च कुम्भेषु शुद्धमुक्ताफलानि च।<br>रोचनां पद्मशङ्खौ च पञ्चरत्नसमन्वितम्॥ ६<br>स्फटिकं चन्दनं श्वेतं तीर्थवारि ससर्षपम्।<br>राजदन्तं सकुमुदं तथैवोशीरगुग्गुलम्।<br>एतत् सर्वं विनिक्षिप्य कुम्भेष्वावाहयेत् सुरान्॥ ७तत्पश्चात् उन कलशोंमें पञ्चगव्य, शुद्ध मुक्ताफल, गोरोचन, कमल, शङ्ख, पञ्चरत्न, स्फटिक, श्वेत चन्दन, तीर्थ-जल, सरसों, राजदन्त (एक ओषधिविशेष), कुमुद (कोइयाँ), खस, गुग्गुल—यह सब डालकर उन कलशोंपर देवताओंका आवाहन करे। (आवाहनका मन्त्र इस प्रकार है—)
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।<br>आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारकाः॥ ८‘यजमानके पापको नष्ट करनेवाले सभी समुद्र, नदियाँ, नद और जलप्रद तीर्थ यहाँ पधारें।’
योऽसौ वज्रधरो देव आदित्यानां प्रभुर्मतः।<br>सहस्रनयनश्चेन्द्रो ग्रहपीडां व्यपोहतु॥ ९(इसके बाद प्रार्थना करे—) ‘जो देवताओंके स्वामी माने गये हैं तथा जिनके एक हजार नेत्र हैं, वे वज्रधारी इन्द्रदेव मेरी ग्रहणजन्य पीडाको दूर करें।
मुखं यः सर्वदेवानां सप्तार्चिरमितद्युतिः।<br>चन्द्रोपरागसम्भूतामग्निः पीडां व्यपोहतु॥ १०जो समस्त देवताओंके मुखस्वरूप, सात ज्वालाओंसे युक्त और अतुल कान्तिवाले हैं, वे अग्निदेव चन्द्र-ग्रहणसे उत्पन्न हुई मेरी पीडाका विनाश करें।
यः कर्मसाक्षी भूतानां धर्मो महिषवाहनः।<br>यमश्चन्द्रोपरागोत्थां मम पीडां व्यपोहतु॥ ११जो समस्त प्राणियोंके कर्मोंके साक्षी हैं तथा महिष जिनका वाहन है, वे धर्मस्वरूप यम चन्द्र-ग्रहणसे उद्भूत हुई मेरी पीडाको मिटायें।