मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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२७८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लक्ष्मा वियुज्यते देव न कदाचिद् यथा भवान्।<br>तथा कलत्रसम्बन्धो देव मा मे वियुज्यताम्॥ ७<br>लक्ष्मा न शून्यं वरद यथा ते शयनं सदा।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथैव मधुसूदन॥ ८<br>गीतवादित्रनिर्घोषं देवदेवस्य कीर्तयेत्।<br>घण्टा भवेदशक्तस्य सर्ववाद्यमयी यतः॥ ९ | देवाधिदेव! जैसे आप कभी लक्ष्मीसे वियुक्त नहीं होते, उसी प्रकार मेरा भी स्त्री-सम्बन्ध कभी खण्डित न हो। वरदाता मधुसूदन! जिस प्रकार आपकी शय्या कभी लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, उसी तरह मेरी भी शय्या स्त्रीसे शून्य न हो।' इस प्रकार प्रार्थना कर गाने-बजानेके माङ्गलिक शब्दोंके साथ-साथ देवाधिदेव भगवान् विष्णुके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। जो गीत-वाद्यके आयोजनमें असमर्थ हो, उसे घण्टाका शब्द कराना चाहिये; क्योंकि घण्टा समस्त बाजोंके समान माना गया है॥ २-९॥ |
| एवं सम्पूज्य गोविन्दमश्नीयात् तैलवर्जितम्।<br>नक्तमक्षारलवणं यावत् तत् स्याच्चतुष्टयम्॥ १०<br>ततः प्रभाते संजाते लक्ष्मीपतिसमन्विताम्।<br>दीपान्नभाजनैर्युक्तां शय्यां दद्याद् विलक्षणाम्॥ ११<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुताम् ।<br>अभीष्टोपस्करैर्युक्तां शुक्लपुष्पाम्बरावृताम्॥ १२<br>सोपधानकविश्रामां फलैर्नानाविधैर्युताम्।<br>तथाऽऽभरणधान्यैश्च यथाशक्त्या समन्विताम्॥ १३<br>अव्यङ्गाङ्गाय विप्राय वैष्णवाय कुटुम्बिने।<br>दातव्या वेदविदुषे भावेनापतिताय च॥ १४<br>तत्रोपवेश्य दाम्पत्यमलं कृत्य विधानतः।<br>पत्न्यास्तु भाजनं दद्याद् भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्॥ १५<br>ब्राह्मणस्यापि सौवर्णीमुपस्करसमन्विताम्।<br>प्रतिमां देवदेवस्य सोदकुम्भां निवेदयेत्॥ १६ | इस प्रकार भगवान् गोविन्दकी पूजा करके रातमें एक बार तेल और क्षार नमकसे रहित अन्नका भोजन करे। ऐसा भोजन तबतक करे, जबतक इस व्रतकी चार आवृत्ति न हो जाय (चार मासतक ऐसा ही भोजन करना चाहिये)। तदनन्तर प्रातःकाल होनेपर एक विलक्षण शय्याका भी दान करनेका विधान है। वह शय्या गद्दा, श्वेत चादर और विश्रामोपयोगी तकियेसे सुशोभित हो; उसपर भगवान् लक्ष्मीपतिकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित हो; उसके निकट दीपक, अन्नके पात्र, खड़ाऊँ, जूता, छाता, चँवर और आसन रखे गये हों; वह अभीष्ट सामग्रियोंसे युक्त हो, उसपर श्वेत पुष्प बिखेरे गये हों, वह नाना प्रकारके ऋतुफलोंसे सम्पन्न हो तथा अपनी शक्तिके अनुसार आभूषण और अन्न आदिसे समन्वित हो। इस प्रकार वह शय्या ऐसे ब्राह्मणको देनी चाहिये, जिसका कोई अङ्ग विकृत न हो तथा जो विष्णु-भक्त, परिवारवाला, वेदज्ञ और आचरणसे पतित न हो। फिर उस शय्यापर द्विजदम्पतिको बैठाकर विधानके अनुसार उन्हें अलंकृत करे। उस समय पत्नीको भक्ष्य एवं भोज्य पदार्थोंसे युक्त बर्तन दान करे और ब्राह्मणको सभी उपकरणोंसे युक्त देवाधिदेव विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमा जलपूर्ण घटके साथ निवेदित करे। (तत्पश्चात् ब्राह्मणको विदा कर व्रत समाप्त करे) ॥ १०-१६॥ |
| एवं यस्तु पुमान् कुर्यादशून्यशयनं हरेः।<br>वित्तशाठ्येन रहितो नारायणपरायणः॥ १७<br>न तस्य पत्न्या विरहः कदाचिदपि जायते।<br>नारी वा विधवा ब्रह्मन् यावच्चन्द्रार्कतारकम्।<br>न विरूपौ न शोकार्तौ दम्पती भवतः क्वचित्॥ १८ | ब्रह्मन्! इस प्रकार जो पुरुष श्रीहरिके अशून्यशयनव्रतका अनुष्ठान करता है, उसे कभी पत्नी-वियोग नहीं होता तथा सधवा अथवा विधवा नारी नारायणपरायण होकर कृपणता छोड़कर इसका अनुष्ठान करती है, वह दम्पति सूर्य-चन्द्रमाके स्थितिपर्यन्त न तो कभी शोकसे दुःखी होते हैं और न उनका रूप ही विकृत होता है। साथ ही |