भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८० * मत्स्यपुराण *


ब्रह्मन् किमर्थमेतत् ते हास्यमाकस्मिकं कृतम्।<br>साधु साध्विति मामेवमुक्तवांस्त्वं वदस्व मे॥ ९<br><br>तमेवंवादिनं शुक्र उवाच वदतां वरः।<br>विस्मयाद् व्रतमाहात्म्याद्धास्यमेतत् कृतं मया॥ १०<br><br>पुरा दक्षविनाशाय कुपितस्य तु शूलिनः।<br>अथ तद्भीमवक्त्रस्य स्वेदबिन्दुर्ललाटजः॥ ११<br><br>भित्त्वा स सप्त पातालाानदहत् सप्त सागरान्।<br>अनेकवक्त्रनयनो ज्वलज्ज्वलनभीषणः॥ १२<br><br>वीरभद्र इति ख्यातः करपादायुतैर्युतः।<br>कृत्वासौ यज्ञमथनं पुनर्भूतलसम्भवः।<br>त्रिजगन्निर्दहन् भूयः शिवेन विनिवारितः॥ १३<br><br>कृतं त्वया वीरभद्र दक्षयज्ञविनाशनम्।<br>इदानीमलमेतेन लोकदाहेन कर्मणा॥ १४<br><br>शान्तिप्रदाता सर्वेषां ग्रहाणां प्रथमो भव।<br>प्रेक्षिष्यन्ते जनाः पूजां करिष्यन्ति वरान्मम॥ १५<br><br>अङ्गारक इति ख्यातिं गमिष्यसि धरात्मज।<br>देवलोकेऽद्वितीयं च तव रूपं भविष्यति॥ १६<br><br>ये च त्वां पूजयिष्यन्ति चतुर्थ्यां त्वद्दिने नराः।<br>रूपमारोग्यमैश्वर्यं तेष्वनन्तं भविष्यति॥ १७<br><br>एवमुक्तस्तदा शान्तिमगमत् कामरूपधृक्।<br>संजातस्तत्क्षणाद् राजन् ग्रहत्वमगमत् पुनः॥ १८<br><br>स कदाचिद् भवांस्तस्य पूजार्घ्यादिकमुत्तमम्।<br>दृष्टवान् क्रियमाणं च शूद्रेण च व्यवस्थितः॥ १९<br><br>तेन त्वं रूपवाञ्जातः सुरशत्रुकुलोद्वह।<br>विविधा च रुचिर्जाता यस्मात् तव विदूरगा॥ २०<br><br>विरोचन इति प्राहुस्तस्मात् त्वां देवदानवाः।<br>शूद्रेण क्रियमाणस्य व्रतस्य तव दर्शनात्।<br>ईदृशीं रूपसम्पत्तिं दृष्ट्वा विस्मितवानहम्॥ २१उनसे पूछा—'ब्रह्मन्! आपने किस प्रयोजनसे यह आकस्मिक हास्य किया है और मुझे 'साधु-साधु' (तुम धन्य हो) ऐसा कहा है? इसका कारण मुझे बतलाइये।' इस प्रकार पूछनेपर विरोचनसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ शुक्राचार्यने कहा—'व्रतके माहात्म्यसे आश्चर्यचकित होकर मैंने यह हास्य किया है। (उस प्रसङ्गको सुनो—) पूर्वकालमें दक्ष-यज्ञका विनाश करनेके लिये जब भयंकर मुखवाले त्रिशूलधारी भगवान् शंकर कुपित हो उठे, तब उनके ललाटसे पसीनेकी एक बूँद टपक पड़ी। वह स्वेदबिन्दु अनेकों मुखों, नेत्रों और दस सहस्र हाथ-पैरोंसे युक्त एक पुरुषाकारमें परिणत हो गया। वह प्रज्वलित अग्निके समान भयंकर पुरुष वीरभद्रके नामसे विख्यात हुआ। उसने सातों पातालोंका भेदन कर सातों सागरोंको भस्म कर दिया। पुनः दक्ष-यज्ञका विध्वंस कर वह भूतलपर आ धमका और त्रिलोकीको जला डालनेके लिये उद्यत हुआ। यह देखकर शिवजीने उसे रोक दिया॥ ५—१३॥<br><br>फिर उन्होंने उसे मना करते हुए कहा—'वीरभद्र! तुमने दक्ष-यज्ञका विनाश तो कर ही दिया, अब तुम अपने इस लोक-दहनरूप क्रूर कर्मको बंद कर दो। मेरे वरदानसे तुम सभी ग्रहोंके लिये शान्ति-प्रदायक बनो और सर्वप्रथम स्थान ग्रहण करो। लोग तुम्हारा दर्शन और पूजन करेंगे। पृथ्वीनन्दन! तुम अङ्गारक नामसे ख्याति प्राप्त करोगे और देवलोकमें तुम्हारा अनुपम रूप होगा। जो मनुष्य तुम्हारा जन्मदिन चतुर्थी तिथि आनेपर तुम्हारी पूजा करेंगे उन्हें अनन्त सौंदर्य, नीरोगता और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होगी।' शिवजीद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाला वीरभद्र तुरंत शान्त हो गया। राजन्! पुनः उसी क्षण (पृथ्वीसे) उत्पन्न होकर उसने ग्रहका स्थान प्राप्त कर लिया। असुरकुलोद्वह! किसी समय शूद्रद्वारा व्यवस्थितरूपसे की जाती हुई उसकी अर्घ्य आदिसे सम्पन्न श्रेष्ठ पूजाको तुमने देख लिया था, इसी कारण तुम सुन्दररूपसे युक्त होकर पैदा हुए हो और तुम्हारी रुचि—प्रतिभा विभिन्न प्रकारके ज्ञानोंवाली और दूरगामिनी है। इसी कारण देवता और दानव तुम्हें विरोचन नामसे पुकारते हैं। शूद्रद्वारा किये जाते हुए व्रतके दर्शनसे प्राप्त हुई तुम्हारी इस प्रकारकी रूप-