मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ * मत्स्यपुराण *
| अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं तथैव सौवर्णमत्यायतबाहुदण्डम् ।<br>चतुर्भुजं हेममये निविष्टं पात्रे गुडस्योपरि सर्पिषा युतम् ॥ ३४ | सात वस्त्रोंसे युक्त धान्यराशि भी प्रस्तुत कर दे। फिर अँगुठेके बराबर लम्बाई-चौड़ाईवाली एक पुरुषाकार मूर्ति बनवाये, जो चार बड़ी भुजाओंसे संयुक्त हो। उसे गुड़के ऊपर रखे हुए स्वर्णमय पात्रमें स्थापित कर दे और उसके निकट घी भी प्रस्तुत कर दे। तत्पश्चात् | | सामस्वरज्ञाय जितेन्द्रियाय पात्राय शीलान्वयसंयुताय ।<br>दातव्यमेतत् सकलं द्विजाय कुटुम्बिने नैव तु दाम्भिकाय ।<br>समर्पयेद् विप्रवराय भक्त्या कृताञ्जलिः पूर्वमुदीर्य मन्त्रम् ॥ ३५ | मूर्तिसहित ये सारी वस्तुएँ ऐसे सुपात्र ब्राह्मणको दान करनी चाहिये, जो सामवेदके स्वर एवं अर्थका ज्ञाता, जितेन्द्रिय, सुशील, कुलीन और विशाल कुटुम्बवाला हो। दाम्भिकको कभी दान नहीं देना चाहिये। उस समय भक्तिपूर्वक हाथ जोड़कर वक्ष्यमाण मन्त्रका उच्चारण करते हुए ऐसे द्विजवरको सारा सामान समर्पित कर दे। | | भूमिपुत्र महातेजः स्वेदोद्भव पिनाकिनः ।<br>रूपार्थी त्वां प्रपन्नोऽहं गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तु ते ॥ ३६ | (उस मन्त्रका भाव इस प्रकार है—) 'महातेजस्वी भूमिपुत्र! आप पिनाकधारी भगवान् शिवके स्वेदबिन्दुसे उद्भूत हुए हैं। मैं सौन्दर्यका अभिलाषी होकर आपकी शरणमें आया हूँ। आपको मेरा नमस्कार है। आप मेरे द्वारा दिया हुआ अर्घ्य ग्रहण कीजिये।' | | मन्त्रेणानेन दत्त्वार्घ्यं रक्तचन्दनवारिणा ।<br>ततोऽर्चयेद् विप्रवरं रक्तमाल्याम्बरादिभिः ॥ ३७ | इस मन्त्रके उच्चारणपूर्वक लाल चन्दनमिश्रित जलसे अर्घ्य देनेके पश्चात् लाल पुष्पोंकी माला और लाल रंगके वस्त्र आदि उपकरणोंसे उन द्विजवरकी अर्चना करे और | | दद्यात् तेनैव मन्त्रेण भौमं गोमिथुनान्वितम् ।<br>शय्यां च शक्तितो दद्यात् सर्वोपस्करसंयुताम् ॥ ३८ | इसी मन्त्रको पढ़कर गौ एवं वृषभसहित मङ्गलकी स्वर्णमयी मूर्तिको उन्हें दान कर दे। उस समय अपनी शक्तिके अनुसार समस्त उपकरणोंसे युक्त शय्याका भी दान करना चाहिये। | | यद् यदिष्टतमं लोके यच्चास्य दयितं गृहे ।<br>तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षय्यमिच्छता ॥ ३९ | साथ ही दाताको लोकमें जो-जो वस्तुएँ अधिक इष्ट हों तथा अपने घरमें भी जो अधिक प्रिय हों, उन सबको अक्षय्यरूपमें प्राप्त करनेकी अभिलाषासे गुणवान् (ब्राह्मण)-को देना चाहिये। | | प्रदक्षिणं ततः कृत्वा विसर्ज्य द्विजपुङ्गवम् ।<br>नक्तमक्षारलवणमश्नीयाद् घृतसंयुतम् ॥ ४० | तदनन्तर उन द्विजश्रेष्ठकी प्रदक्षिणा करके उन्हें विदा कर दे तथा स्वयं रातमें एक बार क्षारनमकरहित एवं घृतयुक्त अन्नका भोजन करे। | | भक्त्या यस्तु पुनः कुर्याद्देवमङ्गारकाष्टकम् ।<br>चतुरो वाथवा तस्य यत् पुण्यं तद् वदामि ते ॥ ४१ | इस प्रकार जो मनुष्य भक्तिपूर्वक पुनः इस अङ्गारक-व्रतका आठ अथवा चार बार अनुष्ठान करता है, उसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। | | रूपसौभाग्यसम्पन्नः पुनर्जन्मनि जन्मनि ।<br>विष्णौ वाथ शिवे भक्तः सप्तद्वीपाधिपो भवेत् ॥ ४२ | वह मनुष्य प्रत्येक जन्ममें सुन्दरता और सौभाग्यसे सम्पन्न होकर विष्णु अथवा शिवकी भक्तिमें लीन होता है और सातों द्वीपोंका अधीश्वर हो जाता है | | सप्तकल्पसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते ।<br>तस्मात् त्वमपि दैत्येन्द्र व्रतमेतत् समाचर ॥ ४३ | तथा सात हजार कल्पोंतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसलिये दैत्येन्द्र! तुम भी इस व्रतका अनुष्ठान करो॥ २७—४३॥ | | पिप्पलाद उवाच | पिप्पलादने कहा— | | इत्येवमुक्त्वा भृगुनन्दनोऽपि<br>जगाम दैत्यश्च चकार सर्वम् । | राजन्! इस प्रकार व्रतका विधान बतलाकर शुक्राचार्य चले गये। तत्पश्चात् दैत्य विरोचनने पूरी विधिके साथ उस व्रतका अनुष्ठान किया। |