भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८४ * मत्स्यपुराण *


श्लोकअर्थ
यावच्छुक्रस्य न कृता पूजा संमाल्यकैः शुभैः।<br>वटकैः पूरिकाभिश्च गोधूमैश्चणकैरपि।<br>तावदन्नं न चाश्नीयात् त्रिभिः कामार्थसिद्धये ॥ ६<br><br>तद्वद् वाचस्पतेः पूजां प्रवक्ष्यामि युधिष्ठिर।<br>सुवर्णपात्रे सौवर्णममरेशपुरोहितम् ॥ ७<br><br>पीतपुष्पाम्बरयुतं कृत्वा स्नात्वाथ सर्षपैः।<br>पलाशाश्वत्थयोगेन पञ्चगव्यजलेन च॥ ८<br><br>पीताङ्गरागवसनो घृतहोमं तु कारयेत्।<br>प्रणम्य च गवा सार्धं ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥ ९<br><br>नमस्तेऽङ्गिरसां नाथ वाक्पते च बृहस्पते।<br>क्रूरग्रहैः पीडितानाममृताय नमो नमः॥ १०<br><br>संक्रान्तावस्य कौन्तेय यात्रास्वभ्युदयेषु च।<br>कुर्वन् बृहस्पतेः पूजां सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ ११विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। शुक्रकी वह पूजा जबतक माङ्गलिक पुष्पमाला, बड़ा, पूरी, गेहूँ और चनाद्वारा सम्पन्न न कर ली जाय, तबतक धर्म, अर्थ और कामकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको अपनी मनोरथ-सिद्धिके लिये भोजन नहीं करना चाहिये॥ १—६॥<br><br>युधिष्ठिर ! इसी प्रकार मैं बृहस्पतिकी भी पूजा-विधि बतला रहा हूँ। व्रतीको चाहिये कि वह सरसों, पलाश, पीपल और पञ्चगव्यसे युक्त जलसे स्नान करे, पीला वस्त्र पहनकर शरीरमें पीला अङ्गराग, चन्दन आदिका अनुलेप करे और ब्राह्मणद्वारा घीका हवन करावे। तत्पश्चात् मूर्तिको प्रणाम करके गौसहित उसे ब्राह्मणको दान कर दे। (उस समय ऐसी प्रार्थना करे—) 'वाणीके अधीश्वर ! आप अङ्गिरा-वंशियोंके स्वामी हैं। बृहस्पते ! क्रूर ग्रहोंसे पीड़ित प्राणियोंके लिये आप अमृततुल्य फलदाता हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।' कुन्तीनन्दन ! सूर्यकी संक्रान्तिके दिन, यात्राओंमें तथा अन्यान्य आभ्युदयिक कार्योंके अवसरपर बृहस्पतिकी पूजा करनेवाला मनुष्य सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ ७—११॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे गुरुशुक्रपूजाविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें शुक्र-गुरु-पूजाविधि नामक तिहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ७३॥


चौहत्तरवाँ अध्याय

कल्याणसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

श्लोकअर्थ
ब्रह्मोवाच<br>भगवन् भवसंसारसागरोत्तारकारक।<br>किञ्चिद् व्रतं समाचक्ष्व स्वर्गारोग्यसुखप्रदम् ॥ १<br><br>ईश्वर उवाच<br>सौरं धर्मं प्रवक्ष्यामि नाम्ना कल्याणसप्तमीम्।<br>विशोकसप्तमीं तद्वत् फलाढ्यां पापनाशिनीम् ॥ २<br><br>शर्करासप्तमीं पुण्यां तथा कमलसप्तमीम्।<br>मन्दारसप्तमीं तद्वच्छुभदां शुभसप्तमीम् ॥ ३**ब्रह्माने पूछा—**भगवन् ! आप तो भवसागररूपी संसारसे उद्धार करनेवाले हैं, अतः कोई ऐसा व्रत बताइये जो स्वर्ग, नीरोगता और सुखका प्रदाता हो ॥ १ ॥<br><br>**ईश्वरने कहा—**ब्रह्मन् ! अब मैं सूर्यसे सम्बन्धित धर्म (व्रत)-का वर्णन कर रहा हूँ, जो लोकमें कल्याणसप्तमी, विशोकसप्तमी, पापनाशिनी फलसप्तमी, पुण्यदायिनी शर्करासप्तमी, कमलसप्तमी, मन्दारसप्तमी तथा मङ्गलप्रदायिनी शुभसप्तमीके नामसे प्रसिद्ध है।