भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296
२८६* मत्स्यपुराण *
अनेन विधिना यस्तु कुर्यात् कल्याणसप्तमीम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यमनन्तमिह जायते॥ १८<br>सर्वपापहरा नित्यं सर्वदैवतपूजिता।<br>सर्वदुष्टोपशमनी सदा कल्याणसप्तमी ॥ १९<br>इमामनन्तफलदां यस्तु कल्याणसप्तमीम्।<br>शृणोति पठते चेह सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ २०जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार इस कल्याणसप्तमीव्रतका अनुष्ठान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इस लोकमें भी उसे अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है; क्योंकि यह कल्याणसप्तमी सदा समस्त पापोंको हरनेवाली और सम्पूर्ण दुष्ट ग्रहोंका शमन करनेवाली है। सभी देवता नित्य इसकी पूजा करते हैं। जो मानव इस लोकमें इस अनन्त फलप्रदायिनी कल्याणसप्तमीकी चर्चा—कथाको सुनता अथवा पढ़ता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ १८—२०॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे कल्याणसप्तमीव्रतं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्याणसप्तमीव्रत नामक चौहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥


पचहत्तरवाँ अध्याय

विशोकसप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य

ईश्वर उवाच<br>विशोकसप्तमीं तद्वद् वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव।<br>यामुपोष्य नरः शोकं न कदाचिदिहाश्नुते॥ १<br>माघे कृष्णातिलैः स्नात्वा षष्ठ्यां वै शुक्लपक्षतः।<br>कृताहारः कृसरया दन्तधावनपूर्वकम्।<br>उपवासव्रतं कृत्वा ब्रह्मचारी भवेन्निशि॥ २<br>ततः प्रभात उत्थाय कृतस्नानजपः शुचिः।<br>कृत्वा तु काञ्चनं पद्ममर्कायेति च पूजयेत्।<br>करवीरेण रक्तेन रक्तवस्त्रयुगेन च॥ ३<br>यथा विशोकं भुवनं त्वयैवादित्य सर्वदा।<br>तथा विशोकता मेऽस्तु त्वद्भक्तिः प्रतिजन्म च॥ ४<br>एवं सम्पूज्य षष्ठ्यां तु भक्त्या सम्पूजयेद् द्विजान्।<br>सुप्त्वा सम्प्राश्य गोमूत्रमुत्थाय कृतनैत्यकः॥ ५<br>सम्पूज्य विप्रानन्नेन गुडपात्रसमन्वितम्।<br>तद्वस्त्रयुग्मं पद्मं च ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ६ईश्वरने कहा—मुनिपुङ्गव! अब मैं उसी प्रकार विशोकसप्तमीव्रतका वर्णन कर रहा हूँ। जिसका अनुष्ठान करके मनुष्य इस लोकमें कभी शोकको नहीं प्राप्त होता। व्रतीको चाहिये कि वह माघमासमें शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिको दातूनसे दाँतोंको साफ करनेके बाद काले तिलमिश्रित जलसे स्नान करे और (तिल-चावलकी) खिचड़ीका भोजन करे। फिर उपवासका व्रत लेकर ब्रह्मचर्यपूर्वक रातमें शयन करे। प्रातःकाल उठकर स्नान, जप आदि नित्यकर्म करके पवित्र हो ले, फिर स्वनिर्मित कमलको स्थापित कर 'अर्काय नमः'—इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए लाल कनेरके पुष्प और दो लाल रंगके वस्त्रोंद्वारा सूर्यकी पूजा करे और ऐसा कहे—'आदित्य! जैसे आपके द्वारा यह सारा जगत् सदा शोकरहित बना रहता है, उसी प्रकार मुझे भी प्रत्येक जन्ममें विशोकता और आपकी भक्ति प्राप्त हो।' इस प्रकार षष्ठी तिथिको भगवान् सूर्यकी पूजा कर ब्राह्मणोंका भी भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। फिर रात्रिमें गोमूत्रका प्राशन कर शयन करे और प्रातःकाल उठकर नित्यकर्मसे निवृत्त हो जाय। तत्पश्चात् अन्नद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके दो वस्त्र और गुड़पूर्ण पात्रसहित वह स्वर्णमय कमल ब्राह्मणको निवेदित कर दे।