मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय ७७ * | २८९ |
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सतहत्तरवाँ अध्याय
शर्करासप्तमीव्रतकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच | ईश्वरने कहा— |
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| शर्करासप्तमीं वक्ष्ये तद्वत् कल्मषनाशिनीम्।<br>आयुरायोग्यमैश्वर्यं ययानन्तं प्रजायते॥ १ | ब्रह्मन्! अब मैं उसी प्रकार पापनाशिनी शर्करासप्तमीका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका अनुष्ठान करनेसे मनुष्यको अनन्त आयु, आरोग्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है। |
| माधवस्य सिते पक्षे सप्तम्यां नियतव्रतः।<br>प्रातः स्नात्वा तिलैः शुक्लैः शुक्लमाल्यानुलेपनैः॥ २ | व्रतनिष्ठ पुरुष वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथिको प्रातःकाल श्वेत तिलोंसे युक्त जलसे स्नान करके श्वेत पुष्पोंकी माला और श्वेत चन्दन धारण कर ले। |
| स्थण्डिले पद्ममालिख्य कुङ्कुमेन सकर्णिकम्।<br>तस्मिन् नमः सवित्रे तु गन्धधूपौ निवेदयेत्॥ ३ | फिर वेदीपर कुङ्कुमसे कर्णिकासहित कमलका चित्र बनावे। उसपर 'सवित्रे नमः' कहकर गन्ध और धूप निवेदित करे। |
| स्थापयेदुदकुम्भं च शर्करापात्रसंयुतम्।<br>शुक्लवस्त्रैरलङ्कृत्य शुक्लमाल्यानुलेपनैः।<br>सुवर्णेन समायुक्तं मन्त्रेणानेन पूजयेत्॥ ४ | फिर उसपर शक्करसे परिपूर्ण पात्रसहित जलपूर्ण कलश स्थापित करे, उसपर स्वर्णमयी मूर्ति रख दे और उसे श्वेत वस्त्रसे सुशोभित करके श्वेत पुष्पमाला और चन्दनद्वारा वक्ष्यमाण-मन्त्रके उच्चारणपूर्वक पूजन करे। |
| विश्ववेदमयो यस्माद् वेदवादीति पठ्यसे।<br>त्वमेवामृतसर्वस्वमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ५ | (वह मन्त्र इस प्रकार है—) 'सूर्यदेव! विश्व और वेद आपके स्वरूप हैं, आप वेदवादी कहे जाते हैं और सभी प्राणियोंके लिये अमृततुल्य फलदायक हैं, अतः मुझे शान्ति प्रदान कीजिये।' |
| पञ्चगव्यं ततः पीत्वा स्वपेत् तत्पार्श्वतः क्षितौ।<br>सौरसूक्तं जपंस्तिष्ठेत् पुराणश्रवणेन वा॥ ६ | तत्पश्चात् पञ्चगव्य पान कर उसी कलशके पार्श्वभागमें भूमिपर शयन करे। उस समय सूर्यसूक्तका जप* अथवा पुराणका श्रवण करते रहना चाहिये। |
| अहोरात्रे गते पश्चादष्टम्यां कृतनैत्यकः।<br>तत् सर्वं वेद विदुषे ब्राह्मणाय निवेदयेत्॥ ७ | इस प्रकार दिन-रात बीत जानेपर अष्टमीके दिन प्रातःकाल नित्यकर्मसे निवृत्त होकर पहलेकी तरह वह सारा सामान वेदज्ञ ब्राह्मणको दान कर दे। |
| भोजयेच्छक्तितो विप्राञ्छर्कराघृतपायसैः।<br>भुञ्जीतातैललवणं स्वयमप्यथ वाग्यतः॥ ८ | पुनः अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको शक्कर, घी और दूधसे बने हुए पदार्थ भोजन करावे और स्वयं भी मौन रहकर तेल और नमकसे रहित पदार्थोंका भोजन करे। |
| अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>संवत्सरान्ते शयनं शर्कराकलशान्वितम्॥ ९ | इसी विधिसे प्रत्येक मासमें सारा कार्य करना चाहिये। एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर शक्करसे पूर्ण कलशसमेत समग्र उपकरणोंसे युक्त शय्या तथा |
| सर्वोपस्करसंयुक्तं तथैकां गां पयस्विनीम्।<br>गृहं च शक्तिमान् दद्यात् समस्तोपस्करान्वितम्॥ १० | एक दुधारू गौ दान करनेका विधान है। व्रती यदि धन-सम्पत्तिसे युक्त हो तो उसे समस्त उपकरणोंसे युक्त गृहका भी दान करना चाहिये। |
| सहस्रेणाथ निष्काणां कृत्वा दद्याच्छतेन वा।<br>दशभिर्वाथ निष्केण तदर्धेनापि शक्तितः॥ ११ | तदनन्तर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल एक हजार अथवा एक सौ अथवा पाँच निष्क (सोलह माशेका एक निष्क होता है जिसे दीनार भी कहते हैं) |
* ऋग्वेदके प्रथम मण्डलका ५० वाँ सूक्त सूर्यसूक्त है।