भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 1098 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306
२९६* मत्स्यपुराण *

| यामत्रये व्यतीते तु सुप्त्वाप्युत्थाय मानवः।<br>अभिगम्य च विप्राणां मिथुनानि तदार्चयेत्॥ २०<br>शक्तिस्तस्त्रीणि चैकं वा वस्त्रमाल्यानुलेपनैः।<br>शयनस्थानि पूज्यानि नमोऽस्तु जलशायिने॥ २१<br>ततस्तु गीतवाद्येन रात्रौ जागरणे कृते।<br>प्रभाते च ततः स्नानं कृत्वा दाम्पत्यमर्चयेत्॥ २२<br>भोजनं च यथाशक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः।<br>भुक्त्वा श्रुत्वा पुराणानि तद् दिनं चातिवाहयेत्॥ २३<br>अनेन विधिना सर्वं मासि मासि समाचरेत्।<br>व्रतान्ते शयनं दद्याद् गुडधेनुसमन्वितम्।<br>सोपधानकविश्रामं सास्तरावरणं शुभम्॥ २४<br>यथा न लक्ष्मीर्देवेश त्वां परित्यज्य गच्छति।<br>तथा सुरूपतारोग्यमशोकश्चास्तु मे सदा॥ २५<br>यथा देवेन रहिता न लक्ष्मीर्जायते क्वचित्।<br>तथा विशोकता मेऽस्तु भक्तिरग्र्या च केशवे॥ २६<br>मन्त्रेणानेन शयनं गुडधेनुसमन्वितम्।<br>शूर्पं च लक्ष्म्या सहितं दातव्यं भूतिमिच्छता॥ २७<br>उत्पलं करवीरं च बाणमम्लानकुङ्कुमम्।<br>केतकी सिन्धुवारं च मल्लिका गन्धपाटला।<br>कदम्बं कुब्जकं जातिः शस्तान्येतानि सर्वदा॥ २८ | करावे। तीन पहर रात व्यतीत होनेपर व्रती मनुष्य स्वयं नींद त्यागकर उठ पड़े और अपनी शक्तिके अनुसार शय्यापर सोते हुए तीन या एक द्विज-दम्पतिके पास जाकर वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे ‘जलशायिने नमोऽस्तु’—जलशायी भगवान्‌को नमस्कार है—यों कहकर उनकी पूजा करे। इस प्रकार रातमें गीत-वाद्य आदि कराकर जागरण करे तथा प्रातःकाल स्नान कर पुनः द्विज-दम्पतिका पूजन करे और कृपणता छोड़कर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल उन्हें भोजन करावे। फिर स्वयं भोजन करके पुराणोंकी कथाएँ सुनते हुए वह दिन व्यतीत करे। प्रत्येक मासमें इसी विधिसे सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये॥ १२—२३ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार व्रतकी समाप्तिके अवसरपर गद्दा, चादर, तकिया आदि उपकरणोंसे युक्त एक सुन्दर शय्या गुड-धेनुके साथ दान करके यों प्रार्थना करे—‘देवेश! जिस प्रकार लक्ष्मी आपका परित्याग करके अन्यत्र नहीं जातीं, उसी प्रकार मुझे सदा सौन्दर्य, नीरोगता और निःशोकता प्राप्त हो। जैसे लक्ष्मी कहीं भी आपसे वियुक्त होकर नहीं प्रकट होतीं, वैसे ही मुझे भी विशोकता और भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो।’ वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको इस मन्त्रके उच्चारणके साथ गुड-धेनुसहित शय्या और लक्ष्मीसहित सूप दान कर देना चाहिये। इस व्रतमें कमल, करवीर (कनेर), बाण (नीलकुसुम या अगस्त्य वृक्षका पुष्प), ताजा (बिना कुम्हलाया हुआ) कुङ्कुम, केतकी (केवड़ा), सिन्दुवार, मल्लिका, गन्धपाटला, कदम्ब, कुब्जक और जाती—ये पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं॥ २४—२८॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे विशोकद्वादशीव्रतं नामैकाशीतितमोऽध्यायः॥ ८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें विशोकद्वादशीव्रत नामक इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८१॥

मत्स्य महापुराण · पृष्ठ 306, कुल 1098 में से · BharatKosha