मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१० * मत्स्यपुराण *
| पूजयेत् पुष्पगन्धाद्यैः प्रभाते च विमत्सरः।<br>पूर्ववद् गुरुमृत्विग्भ्य इमान् मन्त्रानुदीरयेत्॥ ६<br>यदा देवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः।<br>त्वं च रत्नमयो नित्यं नमस्तेऽस्तु सदाचल॥ ७<br>यस्माद् रत्नप्रदानेन तुष्टिं प्रकुरुते हरिः।<br>सदा रत्नप्रदानेन तस्मान्नः पाहि पर्वत॥ ८<br>अनेन विधिना यस्तु दद्याद् रत्नमयं गिरिम्।<br>स याति विष्णुसालोक्यममरेश्वरपूजितः॥ ९<br>यावत्कल्पशतं साग्रं वसेच्चेह नराधिप।<br>रूपारोग्यगुणोपेतः सप्तद्वीपाधिपो भवेत्॥ १०<br>ब्रह्महत्यादिकं किंचिद् यदत्रामुत्र वा कृतम्।<br>तत् सर्वं नाशमायाति गिरिर्वज्रहतो यथा॥ ११ | तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रातःकाल मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—'अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रत्नोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो; अतः तुम्हें सदा हमारा नमस्कार प्राप्त हो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अतः तुम हमारी रक्षा करो।' नराधिप! जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु-सालोक्यको प्राप्त कर लेता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सद्गुणोंसे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। साथ ही उसके द्वारा इहलोक अथवा परलोकमें जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप किये गये होते हैं, वे सभी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वज्रद्वारा प्रहार किया गया हुआ पर्वत॥ १—११॥ |
इति श्रीमत्स्ये महापुराणे रत्नाचलकीर्तनं नाम नवतितमोऽध्यायः॥ ९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें रत्नाचलकीर्तन नामक नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ९०॥
इक्यानबेवाँ अध्याय
रजताचलके दानकी विधि और उसका माहात्म्य
| ईश्वर उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि रौप्याचलमनुत्तमम्।<br>यत्प्रदानान्नरो याति सोमलोकमनुत्तमम्॥ १<br>दशभिः पलसाहस्रैरुत्तमो रजताचलः।<br>पञ्चभिर्मध्यमः प्रोक्तस्तदर्धेनाधमः स्मृतः॥ २<br>अशक्तो विंशतेरूर्ध्वं कारयेच्छक्तितस्तदा।<br>विष्कम्भपर्वतांस्तद्वत् तुरीयांशेन कल्पयेत्॥ ३<br>पूर्ववद् राजतान् कुर्वन् मन्दरादीन् विधानतः।<br>कलधौतमयांस्तद्वल्लोकेशानर्चयेद् बुधः॥ ४<br>ब्रह्मविष्ण्वर्कवान् कार्यो नितम्बोऽत्र हिरण्मयः।<br>रजतं स्याद् यदन्येषां कार्यं तदिह काञ्चनम्॥ ५ | ईश्वरने कहा—नारद! इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ रौप्याचल अर्थात् रजतशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसका दान करनेसे मनुष्य सर्वश्रेष्ठ चन्द्रलोकको प्राप्त करता है। दस हजार पल चाँदीसे बना हुआ रजताचल उत्तम, पाँच हजार पलसे बना हुआ मध्यम और ढाई हजार पलसे बना हुआ अधम कहा गया है। यदि दाता ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे कुछ अधिक चाँदीद्वारा पर्वतका निर्माण कराना चाहिये। उसी प्रकार प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनेका विधान है। पहलेकी तरह चाँदीके द्वारा मन्दर आदि पर्वतोंका निर्माण कर उनके नितम्बभागको सोनेसे सुशोभित कर दे। उनपर लोकपालोंकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और सूर्यकी मूर्तियोंसे भी संयुक्त कर दे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् दाता इन सबकी विधिपूर्वक अर्चना करे। सारांश यह है कि अन्य पर्वतोंमें जो उपकरण चाँदीके होते हैं, वे सभी इसमें सुवर्णके होने चाहिये। |