भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ६ *३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।<br>विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूद् येषां मध्ये महाबलः ॥ १६<br>द्विमूर्धा शकुनिश्चैव तथा शङ्कुशिरोधरः।<br>अयोमुखः शम्बरश्च कपिशो वामनस्तथा ॥ १७<br>मारीचिर्मेघवांश्चैव इरागर्भशिरास्तथा।<br>विद्रावणश्च केतुश्च केतुवीर्यः शतह्रदः ॥ १८<br>इन्द्रजित् सप्तजिच्चैव वज्रनाभस्तथैव च।<br>एकचक्रो महाबाहुर्वज्राक्षस्तारकस्तथा ॥ १९<br>असिलोमा पुलोमा च बिन्दुबार्णो महासुरः।<br>स्वर्भानुर्वृषपर्वा च एवमाद्या दनोः सुताः ॥ २०इसी प्रकार दनुने भी कश्यपके संयोगसे सौ बलशाली पुत्रोंको प्राप्त किया, जिनमें महाबली विप्रचित्ति प्रधान था। इसके अतिरिक्त द्विमूर्धा, शकुनि, शंकुशिरोधर, अयोमुख, शम्बर, कपिश, वामन, मारीचि, मेघवान्, इरागर्भशिरा, विद्रावण, केतु, केतुवीर्य, शतह्रद, इन्द्रजित्, सप्तजित्, वज्रनाभ, एकचक्र, महाबाहु, वज्राक्ष, तारक, असिलोमा, पुलोमा, बिन्दु, महासुर बाण, स्वर्भानु और वृषपर्वा—ये तथा इसी प्रकारके और भी दनुके पुत्र थे।
स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शची चैव पुलोमजा।<br>उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहूः ॥ २१<br>शर्मिष्ठा सुन्दरी चैव चन्द्रा च वृषपर्वणः।<br>पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते हि ते ॥ २२इनमें स्वर्भानुकी प्रभा, पुलोमाकी शची, मयकी उपदानवी, मन्दोदरी और कुहू, वृषपर्वाकी शर्मिष्ठा, सुन्दरी और चन्द्रा तथा वैश्वानरकी पुलोमा और कालका नामकी कन्याएँ थीं।
बह्वपत्ये महासत्त्वे मारीचस्य परिग्रहे।<br>तयोः षष्टिसहस्राणि दानवानामभूत् पुरा ॥ २३<br>पौलोमान् कालकेयांश्च मारीचोऽजनयत् पुरा।<br>अवध्या येऽमराणां वै हिरण्यपुरवासिनः ॥ २४<br>चतुर्मुखाल्लब्धवरास्ते हता विजयेन तु।इनमें महान् बलशालिनी एवं बहुत-सी संतानोंवाली पुलोमा और कालका मरीचि-पुत्र कश्यपकी पत्नियाँ थीं। इन दोनोंसे पूर्वकालमें साठ हजार दानवोंकी उत्पत्ति हुई थी। पूर्वकालमें मरीचिनन्दन कश्यपने* (इन्हीं पुलोमा और कालकाके गर्भसे) पौलोम और कालकेय संज्ञक दानवोंको पैदा किया था, जो हिरण्यपुरमें निवास करते थे तथा ब्रह्मासे वरदान प्राप्त होनेके कारण वे देवताओंके लिये भी अवध्य थे; परंतु विजय (अर्जुन)—ने उनका संहार कर डाला।
विप्रचित्तिः सैंहिकेयान् सिंहिकायामजीजनत् ॥ २५<br>हिरण्यकशिपोर्ये वै भागिनेयास्त्रयोदश।<br>व्यंसः कल्पश्च राजेन्द्र नलो वातापिरेव च ॥ २६<br>इल्वलो नमुचिश्चैव श्वसृपश्राजनस्तथा।<br>नरकः कालनाभश्च सरमाणस्तथैव च ॥ २७<br>कालवीर्यश्च विख्यातो दनुवंशविवर्धनाः।विप्रचित्तिने सिंहिकाके गर्भसे सैंहिकेय-संज्ञक पुत्रोंको जन्म दिया, जिनकी संख्या तेरह थी। ये हिरण्यकशिपुके भानजे थे। उनके नाम ये हैं—व्यंस, कल्प, राजेन्द्र, नल, वातापि, इल्वल, नमुचि, श्वसृप, अजन, नरक, कालनाभ, सरमाण तथा प्रसिद्ध कालवीर्य। ये सभी दनु-वंशको बढ़ानेवाले थे।
संह्रादस्य तु दैत्यस्य निवातकवचाः स्मृताः ॥ २८<br>अवध्याः सर्वदेवानां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>ये हता भर्गमाश्रित्य त्वर्जुनेन रणाजिरे ॥ २९दैत्य संह्रादके पुत्र निवातकवचके नामसे विख्यात हुए। वे सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, नागों और राक्षसोंद्वारा अवध्य थे; किंतु अर्जुनने शिवजीका आश्रय ग्रहण करके रणभूमिमें उन्हें यमलोकका पथिक बना दिया।
षट् कन्या जनयामास ताम्रा मारीचबीजतः।<br>शुकी श्येनी च भासी च सुग्रीवी गृधिका शुचिः ॥ ३०ताम्राने कश्यपसे शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका और शुचि नामक छः कन्याओंको जन्म दिया।

* वाल्मी० रामा० १।१।२० आदि, भागवत० १।६।३१, ३।१२।३२, ४।१।१३, ९।१।१०, विष्णुपुराण १।१५।१३१, २१।८, मत्स्य० ३।६, ४।२६, ११५।९, वायु० ५०।१६८, ५२।२५, १०१।३५, ४९, ब्रह्माण्ड० २।३२।९६, २।२१।४३-४४ आदिके अनुसार मरीचि ऋषिके एकमात्र पुत्र कश्यप ही हैं। किसी-किसी पुराणमें उनका एक दूसरा पुत्र 'पौर्णमास' भी निर्दिष्ट है।