मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आयसं राहवे दद्यात् केतुभ्यश्छागमुत्तमम्।<br>सुवर्णेन समा कार्या यजमानेन दक्षिणा॥ ६२<br>सर्वेषामथवा गावो दातव्या हेमभूषिताः।<br>सुवर्णमथवा दद्याद् गुरुर्वा येन तुष्यति।<br>समन्त्रेणैव दातव्याः सर्वाः सर्वत्र दक्षिणाः॥ ६३ | राहुके लिये लोहेकी बनी हुई वस्तुका और केतुके लिये उत्तम बकरेका दान करे। यजमानको ये सारी दक्षिणाएँ सुवर्णके साथ अथवा स्वर्णनिर्मित मूर्तिके रूपमें देनी चाहिये अथवा जिस प्रकार गुरु (पुरोहित) प्रसन्न हों, उनके आज्ञानुसार सभी ब्राह्मणोंको सुवर्णसे अलंकृत गौएँ अथवा केवल सुवर्ण दान करना चाहिये। किंतु सर्वत्र मन्त्रोच्चारणपूर्वक ही इन सभी दक्षिणाओंके देनेका विधान है॥ ५८—६३॥ |
| कपिले सर्वदेवानां पूजनीयासि रोहिणी।<br>तीर्थदेवमयी यस्मादतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६४ | (दान देते समय सभी देय वस्तुओंसे पृथक्-पृथक् इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—) 'कपिले! तुम रोहिणीरूपा हो, तीर्थ एवं देवता तुम्हारे स्वरूप हैं तथा तुम सम्पूर्ण देवोंकी पूजनीया हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।* |
| पुण्यस्त्वं शङ्ख पुण्यानां मङ्गलानां च मङ्गलम्।<br>विष्णुना विधृतश्चासि ततः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६५ | शङ्ख! तुम पुण्योंके भी पुण्य और मङ्गलोंके भी मङ्गल हो। भगवान् विष्णुने तुम्हें अपने हाथमें धारण किया है, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| धर्मस्त्वं वृषरूपेण जगदानन्दकारक।<br>अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६६ | जगत्को आनन्दित करनेवाले वृषभ! तुम वृषरूपसे धर्म और अष्टमूर्ति शिवजीके वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| हिरण्यगर्भगर्भस्त्वं हेमबीजं विभावसोः।<br>अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६७ | सुवर्ण! तुम ब्रह्माके आत्मस्वरूप, अग्निके स्वर्णमय बीज और अनन्त पुण्यफलके प्रदाता हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| पीतवस्त्रयुगं यस्माद् वासुदेवस्य वल्लभम्।<br>प्रदानात् तस्य मे विष्णो ह्यतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६८ | दो पीला वस्त्र अर्थात् पीताम्बर भगवान् श्रीकृष्णको परम प्रिय हैं, इसलिये विष्णो! उसका दान करनेसे आप मुझे शान्ति प्रदान करें। |
| विष्णुस्त्वमश्वरूपेण यस्मादमृतसम्भवः।<br>चन्द्रार्कवाहनो नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ६९ | अश्व! तुम अश्वरूपसे विष्णु हो, अमृतसे उत्पन्न हुए हो तथा सूर्य एवं चन्द्रमाके नित्य वाहन हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| यस्मात् त्वं पृथिवी सर्वा धेनुः केशवसंनिभा।<br>सर्वपापहरा नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७० | पृथ्वी! तुम समस्त धेनुस्वरूपा, केशवके सदृश फलदायिनी और सदा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाली हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| यस्मादायसकर्माणि तवाधीनानि सर्वदा।<br>लाङ्गलाद्यायुधादीनि तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७१ | लौह! चूँकि विश्वके सभी सम्पादित होनेवाले लौह कर्म हल एवं अस्त्र आदि सारे कार्य सदा तुम्हारे ही अधीन हैं, इसलिये तुम मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| छाग त्वं सर्वयज्ञानामङ्गत्वेन व्यवस्थितः।<br>यानं विभावसोर्नित्यमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥ ७२ | छाग! चूँकि तुम सम्पूर्ण यज्ञोंके मुख्य अङ्गरूपसे निर्धारित हो और अग्निदेवके नित्य वाहन हो, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करो। |
| गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनानि चतुर्दश।<br>यस्मात् तस्माच्छ्रियै मे स्यादिह लोके परत्र च॥ ७३ | गौ! चूँकि गौओंके अङ्गोंमें चौदहों भुवन निवास करते हैं, इसलिये तुम मेरे लिये इहलोक एवं परलोकमें भी लक्ष्मी प्रदान करो। |
| यस्मादशून्यं शयनं केशवस्य च सर्वदा।<br>शय्या ममाप्यशून्यास्तु दत्ता जन्मनि जन्मनि॥ ७४ | जिस प्रकार भगवान् केशवकी शय्या सदा अशून्य (लक्ष्मीसे युक्त) रहती है, वैसे ही मेरे द्वारा भी दान की गयी शय्या जन्म-जन्ममें अशून्य बनी रहे। |
| यथा रत्नेषु सर्वेषु सर्वे देवाः प्रतिष्ठिताः।<br>तथा रत्नानि यच्छन्तु रत्नदानेन मे सुराः॥ ७५ | जैसे सभी रत्नोंमें समस्त देवता निवास करते हैं, वैसे ही रत्नदान करनेसे वे देवता मुझे भी रत्न प्रदान करें। |
* तुलनीय—'इडे रन्ते हव्ये काम्ये चन्द्रे' आदि (यजु० ८।४३ और उसके उव्वट-महीधरादिभाष्य)।