भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 384, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 384

३७४ * मत्स्यपुराण *


| बहुक्लेशेन युज्यन्ते तेन यान्ति परां गतिम्।<br><br>त्रिकालं जायते ज्ञानं स्वर्गलोकं गमिष्यति॥ १९ | संयोग बड़े कष्टसे मिलता है; क्योंकि उसके संयोगसे मनुष्यको परमगतिकी प्राप्ति हो जाती है, उसके हृदयमें तीनों कालोंका ज्ञान उत्पन्न हो जाता है और वह स्वर्गलोकको चला जाता है॥ ११—१९॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे प्रयागमाहात्म्ये दशाधिकशततमोऽध्यायः॥ ११०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके प्रयाग-माहात्म्यमें एक सौ दसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ११०॥


एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय

प्रयागमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवके निवासका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच<br>कथं सर्वमिदं प्रोक्तं प्रयागस्य महामुने।<br>एतन्नः सर्वमाख्याहि यथा हि मम तारयेत्॥ १युधिष्ठिरने पूछा— महामुने! आपने तो यह सारा महत्त्व प्रयागका ही बतलाया है, इसका क्या कारण है? यह सब मुझे बतलािये, जिससे मेरा तथा मेरे कुटुम्बका उद्धार हो जाय॥ १॥
मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु राजन् प्रयागे तु प्रोक्तं सर्वमिदं जगत्।<br>ब्रह्मा विष्णुस्तथेशानो देवताः प्रभुरव्ययः॥ २<br>ब्रह्मा सृजति भूतानि स्थावरं जङ्गमं च यत्।<br>तान्येतानि परं लोके विष्णुः संवर्धते प्रजाः॥ ३<br>कल्पान्ते तत् समग्रं हि रुद्रः संहरते जगत्।<br>तदा प्रयागतीर्थं च न कदाचिद् विनश्यति॥ ४<br>ईश्वरं सर्वभूतानां यः पश्यति स पश्यति।<br>यत्नेनानेन तिष्ठन्ति ते यान्ति परमां गतिम्॥ ५मार्कण्डेयजीने कहा— राजन्! इसका कारण सुनो। प्रयागमें इस सारे जगत्‌का निवास बतलाया जाता है। यहाँ अविनाशी एवं सामर्थ्यशाली ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सम्पूर्ण देवता वास करते हैं, ब्रह्मा जिन स्थावर-जङ्गम्रूप प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, उन सभी प्रजाओंका इस लोकमें भगवान् विष्णु पालन करते हैं तथा कल्पान्तमें रुद्र इस सारे जगत्‌का संहार कर देते हैं, किंतु इस प्रयागतीर्थका कभी विनाश नहीं होता। सम्पूर्ण प्राणियोंका जो ईश्वर है, उसे जो देखता है, वही सचमुच देखनेवाला है। इस प्रयत्नसे जो लोग प्रयागमें निवास करते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं॥ २—५॥
युधिष्ठिर उवाच<br>आख्याहि मे यथातथ्यं यथैषा तिष्ठति श्रुतिः।<br>केन वा कारणेनैव तिष्ठन्ते लोकसत्तमाः॥ ६युधिष्ठिरने पूछा— मुने! ये लोकश्रेष्ठ देवगण किस कारणवश प्रयागमें निवास करते हैं, इस विषयमें जैसा श्रुति-वचन हो, उसके अनुसार मुझे यथार्थरूपसे बतलािये॥ ६॥
मार्कण्डेय उवाच<br>प्रयागे निवसन्त्येते ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः।<br>कारणं तत् प्रवक्ष्यामि शृणु तत्त्वं युधिष्ठिर॥ ७<br>पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम्।<br>तिष्ठन्ति रक्षणायात्र पापकर्मनिवारणात्॥ ८<br>उत्तरेण प्रतिष्ठानाच्छद्मना ब्रह्म तिष्ठति।<br>वेणीमाधवरूपी तु भगवांस्तत्र तिष्ठति॥ ९मार्कण्डेयजीने कहा— युधिष्ठिर! ये ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिस प्रयोजनसे प्रयागमें निवास करते हैं, वह कारण बतला रहा हूँ; उसके तत्त्वको श्रवण करो। प्रयागका मण्डल पाँच योजनमें फैला हुआ है। यहाँ पापकर्मका निवारण तथा प्राणियोंकी रक्षा करनेके लिये उपर्युक्त देवगण निवास करते हैं। प्रतिष्ठानपुरसे उत्तरकी ओर गुप्तरूपसे ब्रह्माजी निवास करते हैं। भगवान् विष्णु प्रयागमें वेणीमाधवरूपसे विद्यमान हैं
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