भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८२* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
रतिप्रधाना विमला जायन्ते यत्र मानवाः।<br>शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे ते प्रियदर्शनाः॥ ६१<br>तत्रापि च महावृक्षो न्यग्रोधो रोहिणो महान्।<br>तस्यापि ते फलरसं पिबन्तो वर्तयन्ति हि॥ ६२<br>दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च।<br>जीवन्ति ते महाभागाः सदा हृष्टा नरोत्तमाः॥ ६३<br>उत्तरेण तु श्वेतस्य पार्श्वे शृङ्गस्य दक्षिणे।<br>वर्षं हिरण्वतं नाम यत्र हैरण्वती नदी॥ ६४<br>महाबला महासत्त्वा नित्यं मुदितमानसाः।<br>शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे च प्रियदर्शनाः॥ ६५<br>एकादश सहस्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः।<br>आयुष्प्रमाणं जीवन्ति शतानि दश पञ्च च॥ ६६<br>तस्मिन् वर्षे महावृक्षो लकुचः पत्रसंश्रयः।<br>तस्य पीत्वा फलरसं तत्र जीवन्ति मानवाः॥ ६७<br>शृङ्गासाहस्य शृङ्गाणि त्रीणि तानि महान्ति वै।<br>एकं मणियुतं तत्र एकं तु कनकान्वितम्।<br>सर्वरत्नमयं चैकं भुवनैरुपशोभितम्॥ ६८प्रजाएँ विशेष विलासिनी एवं स्वच्छ गौरवर्णवाली होती हैं। वहाँ उत्पन्न हुए सारे मानव गौरवर्ण, कुलीन और देखनेमें प्रिय लगनेवाले होते हैं। वहाँ भी रोहिण नामक एक महान् बरगदका वृक्ष है, उसीके फलोंका रस पान करके वहाँके निवासी जीवन-निर्वाह करते हैं। वे सभी महान् भाग्यशाली श्रेष्ठ पुरुष सदा प्रसन्न रहते हुए ग्यारह हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। श्वेत पर्वतके उत्तर और शृङ्गवान् पर्वतके दक्षिण पार्श्वमें हिरण्वत नामक वर्ष है, जहाँ हैरण्वती नामकी नदी प्रवाहित होती है। वहाँके निवासी श्रेष्ठ मानव, महाबली, महापराक्रमी, नित्य प्रसन्नचित्त, गौरवर्ण, कुलीन और देखनेमें मनोरम होते हैं। वे बारह हजार पाँच सौ वर्षोंकी आयुतक जीवित रहते हैं। उस वर्षमें पत्तोंसे आच्छादित लकुच (बड़हर)- का एक महान् वृक्ष है, उसके फलोंका रस पीकर वहाँके मानव जीवनयापन करते हैं। शृङ्गवान् पर्वतके तीन शिखर हैं, जो बड़े ऊँचे-ऊँचे हैं। उनमेंसे एक मणिसे परिपूर्ण, एक सुवर्णसे सम्पन्न और एक सर्वरत्नमय एवं भुवनोंसे सुशोभित है॥ ६०—६८॥
उत्तरे चास्य शृङ्गस्य समुद्रान्ते च दक्षिणे।<br>कुरवस्तत्र तद्वर्षं पुण्यं सिद्धनिषेवितम्॥ ६९<br>तत्र वृक्षा मधुफला दिव्यामृतमयाऽऽपगाः।<br>वस्त्राणि ते प्रसूयन्ते फलैश्चाभरणानि च॥ ७०<br>सर्वकामप्रदातारः केचिद् वृक्षा मनोरमाः।<br>अपरे क्षीरिणो नाम वृक्षास्तत्र मनोरमाः।<br>ये रक्षन्ति सदा क्षीरं षड्रसं चामृतोपमम्॥ ७१<br>सर्वा मणिमयी भूमिः सूक्ष्मा काञ्चनवालुका।<br>सर्वत्र सुखसंस्पर्शा निःशब्दाः पवनाः शुभाः॥ ७२<br>देवलोकच्युतास्तत्र जायन्ते मानवाः शुभाः।<br>शुक्लाभिजनसम्पन्नाः सर्वे ते स्थिरयौवनाः॥ ७३<br>मिथुनानि प्रजायन्ते स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः।<br>तेषां ते क्षीरिणां क्षीरं पिबन्ति ह्यमृतोपमम्॥ ७४<br>एकाहाज्जायते युग्मं समं चैव विवर्धते।<br>समं रूपं च शीलं च समं चैव म्रियन्ति वै॥ ७५इस शृङ्गवान् पर्वतके उत्तर और दक्षिण समुद्र-तटतक उत्तरकुरु नामक वर्ष है जो परम पुण्यप्रद एवं सिद्धोंद्वारा सुसेवित है। वहाँ नदियोंमें दिव्य अमृततुल्य जल प्रवाहित होता है। वृक्ष मधुसदृश मीठे फलवाले होते हैं और उन्हींसे वस्त्र, फल और आभूषणोंकी उत्पत्ति होती है। उनमेंसे कुछ वृक्ष तो अत्यन्त सुन्दर और सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं तथा दूसरे कुछ ऐसे मनोहर वृक्ष हैं, जिनसे दूध निकलता है। वे सदा दूध और अमृततुल्य सुस्वादु छहों रसोंकी रक्षा करते हैं। वहाँकी सारी भूमि मणिमयी है जिसपर सुवर्णकी महीन बालुका बिखरी रहती है। चारों ओर सुख-स्पर्शवाली शब्दरहित शीतल-मंद-सुगन्ध वायु बहती रहती है। वहाँ देवलोकसे च्युत हुए धर्मात्मा मानव ही जन्म धारण करते हैं। वे सभी गौरवर्ण, कुलीन और स्थिर जवानीसे युक्त होते हैं। वे जोड़ेके रूपमें उत्पन्न होते हैं, उनमें स्त्रियाँ अप्सराओंकी भाँति सुन्दरी होती हैं। वे उन दूधसे भरे हुए वृक्षोंके अमृततुल्य दूधका पान करते हैं। वे प्राणी एक ही दिन जोड़ेके रूपमें उत्पन्न होते हैं, साथ-ही-साथ बढ़ते हैं, उनका रूप तथा शील-स्वभाव एक-