मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३८८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत | हिन्दी |
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| पृष्टस्त्वेवं तदा विप्रैर्यथाप्रश्नं विशेषतः।<br>उवाच ऋषिभिर्दृष्टं पुराणाभिमतं तथा॥ ६२ | उन ब्रह्मर्षियोंद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर सूतजीने उनके प्रश्नके अनुकूल जैसा देखा था तथा जो पुराण-सम्मत था, वैसा उत्तर देना प्रारम्भ किया॥ ६०-६२॥ |
| सूत उवाच<br><br>शुश्रूषवस्तु यद् विप्राः शुश्रूषध्वमतन्द्रिताः।<br>जम्बूवर्षः किम्पुरुषः सुमहान् नन्दनोपमः॥ ६३<br>दश वर्षसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुषे स्मृता।<br>जायन्ते मानवास्तत्र निष्टप्तकनकप्रभाः॥ ६४<br>वर्षे किम्पुरुषे पुण्ये प्लक्षो मधुवहः स्मृतः।<br>तस्य किम्पुरुषाः सर्वे पिबन्ति रसमुत्तमम्॥ ६५<br>अनामया ह्यशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः।<br>सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसः स्मृताः॥ ६६<br>ततः परं किम्पुरुषाद्धरिवर्षं प्रचक्षते।<br>महारजतसंकाशा जायन्ते यत्र मानवाः॥ ६७<br>देवलोकच्युताः सर्वे बहुरूपाश्च सर्वशः।<br>हरिवर्षे नराः सर्वे पिबन्तीक्षुरसं शुभम्॥ ६८<br>न जरा बाधते तत्र तेन जीवन्ति ते चिरम्।<br>एकादश सहस्राणि तेषामायुः प्रकीर्तितम्॥ ६९<br>मध्यमं यन्मया प्रोक्तं नाम्ना वर्षमिलावृतम्।<br>न तत्र सूर्यस्तपति न च जीर्यन्ति मानवाः॥ ७०<br>चन्द्रसूर्यौ सनक्षत्रावप्रकाशाविलावृते।<br>पद्मप्रभाः पद्मवर्णाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः॥ ७१<br>पद्मगन्धाश्च जायन्ते तत्र सर्वे च मानवाः।<br>जम्बूफलरसाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः॥ ७२<br>देवलोकच्युताः सर्वे महारजतवाससः।<br>त्रयोदश सहस्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः॥ ७३<br>आयुष्प्रमाणं जीवन्ति ये तु वर्ष इलावृते। | **सूतजी कहते हैं—**ब्राह्मणो! आपलोग जिस विषयको सुनना चाहते हैं, उसे बतला रहा हूँ, आलस्यरहित होकर श्रवण कीजिये। जम्बूवर्ष और किम्पुरुषवर्ष—ये दोनों अत्यन्त विशाल एवं नन्दन-वनकी भाँति शोभासम्पन्न हैं। इनमें किम्पुरुषवर्षमें मनुष्योंकी आयु दस हजार वर्षकी बतलायी जाती है। वहाँ जन्म लेनेवाले मनुष्य भलीभाँति तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले होते हैं। उस पुण्यमय किम्पुरुषवर्षमें एक पाकड़का वृक्ष बतलाया जाता है जिससे सदा मधु टपकता रहता है। उसके उस उत्तम रसको सभी किम्पुरुषनिवासी पान करते हैं, जिसके कारण वे नीरोग, शोकरहित और सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं। वहाँ पुरुषोंके शरीरका रंग सुवर्ण-जैसा होता है और स्त्रियाँ अप्सराओं-जैसी सुन्दरी कही गयी हैं। उस किम्पुरुषवर्षके बाद हरिवर्ष बतलाया जाता है। वहाँ सुवर्णकी-सी कान्तिसे युक्त शरीरवाले मानव उत्पन्न होते हैं। वे सभी देवलोकसे च्युत हुए जीव होते हैं और उनके विभिन्न प्रकारके रूप होते हैं। हरिवर्षमें सभी मनुष्य मङ्गलमय इक्षु-रसका पान करते हैं, जिससे उन्हें वृद्धावस्था बाधा नहीं पहुँचाती और वे चिरकालतक जीवित रहते हैं। उनकी आयुका प्रमाण ग्यारह हजार वर्ष बतलाया जाता है। इनके बीचमें इलावृत नामक वर्ष है, जिसका वर्णन मैं पहले ही कर चुका हूँ। वहाँ सूर्यका ताप नहीं होता। वहाँके मानव भी वृद्ध नहीं होते। इलावृतवर्षमें नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा और सूर्यका प्रकाश नहीं होता। यहाँ पैदा होनेवाले सभी मानवोंके शरीर कमलके-से कान्तिमान् और उनका रंग कमल-जैसा लाल होता है। उनके नेत्र कमल-दलके समान विशाल होते हैं और उनके शरीरसे कमलकी-सी गन्ध निकलती है। जामुनके फलका रस उनका आहार है। वे निस्पन्दरहित एवं सुगन्धयुक्त होते हैं। उनके वस्त्र सुवर्णके तारोंसे खचित होते हैं। देवलोकसे च्युत हुए जीव ही यहाँ जन्म धारण करते हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष इलावृतवर्षमें पैदा होते हैं वे तेरह हजार वर्षोंकी आयुतक जीवित रहते हैं॥ ६३-७३ १/२ ॥ |
| मेरोस्तु दक्षिणे पार्श्वे निषधस्योत्तरेण वा॥ ७४ | मेरुगिरिके दक्षिण तथा निषधपर्वतके उत्तर भागमें |