भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय ११६ * । ३९१
स तु मद्रपती राजा यस्तु नाम्ना पुरूरवाः।<br>तस्मिञ्जन्मन्यसौ विप्रो द्वादश्यां तु सदानघ॥ ११<br>उपोष्य पूजयामास राज्यकामो जनार्दनम्।<br>चकार सोपवासश्च स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम्॥ १२<br>उपवासफलात् प्राप्तं राज्यं मद्रेष्वकण्टकम्।<br>उपोषितस्तथाभ्यङ्गाद् रूपहीनो व्यजायत॥ १३<br>उपोषितैर्नरैस्तस्मात् स्नानमभ्यङ्गपूर्वकम्।<br>वर्जनीयं प्रयत्नेन रूपघ्नं तत्परं नृप॥ १४<br>एतद् वः कथितं सर्वं यद् वृत्तं पूर्वजन्मनि।<br>मद्रेश्वरानुचरितं शृणु तस्य महीपतेः॥ १५<br>तस्य राजगुणैः सर्वैः समुपेतस्य भूपतेः।<br>जनानुरागो नैवासीद् रूपहीनस्य तस्य वै॥ १६<br>रूपकामः स मद्रेशस्तपसे कृतनिश्चयः।<br>राज्यं मन्त्रिगतं कृत्वा जगाम हिमपर्वतम्॥ १७<br>व्यवसायद्वितीयस्तु पद्भ्यामेव महायशाः।<br>द्रष्टुं स तीर्थसदनं विषयान्ते स्वके नदीम्।<br>ऐरावतीति विख्यातां ददर्शातिमनोरमाम्॥ १८<br>तुहिनगिरिभवां महौघवेगां<br>तुहिनगभस्तिसमानशीतलोदाम् ।<br>तुहिनसदृशहैमवर्णपुञ्जां<br>तुहिनयशाः सरितं ददर्श राजा॥ १९अनघ! वह मद्र देशका स्वामी जो राजा पुरूरवाके नामसे विख्यात था, उस जन्ममें ब्राह्मणरूपसे राज्यप्राप्तिकी कामनासे युक्त होकर सदा द्वादशी तिथिको उपवास कर भगवान् विष्णुका पूजन किया करता था। एक बार उसने व्रतोपवास करके शरीरमें तेल लगाकर स्नान कर लिया—जिस कारण उसे उपवासके फलस्वरूप मद्र देशका निष्कण्टक राज्य तो प्राप्त हुआ, परंतु उपवासी होकर शरीरमें तेल लगानेके कारण वह कुरूप होकर पैदा हुआ। इसलिये व्रतोपवासी मनुष्यको प्रयत्नपूर्वक शरीरमें तेल लगाकर स्नान करना छोड़ देना चाहिये; क्योंकि यह सुन्दरताका विनाशक है। इस प्रकार उसके पूर्वजन्मका जो वृत्तान्त था, वह सब मैंने आप लोगोंको बतला दिया। अब उस भूपालके मद्रेश्वर हो जानेके बादका चरित्र सुनिये। यद्यपि राजा पुरूरवा सभी राज्यगुणोंसे सम्पन्न था, किंतु रूपहीन होनेके कारण उसके प्रति प्रजाओंका अनुराग नहीं ही था। अतः मद्र-नरेशने रूपप्राप्तिकी कामनासे तपस्याका निश्चय करके राज्य-भार मन्त्रीको सौंपकर हिमालय पर्वतकी ओर प्रस्थान किया। उस समय तपरूप व्यवसाय ही उसका सहायक था। वह महायशस्वी नरेश तीर्थस्थानोंका दर्शन करनेकी लालसासे पैदल ही चल रहा था। आगे बढ़नेपर उसने अपने देशकी सीमापर ऐरावती (रावी) नामसे विख्यात अत्यन्त मनोहारिणी नदीको देखा। वह नदी हिमालय पर्वतसे निकली हुई थी, अथाह जलके कारण गम्भीर वेगसे प्रवाहित हो रही थी, उसका जल चन्द्रमाके समान शीतल था और वह बर्फकी राशि-सरीखी उज्ज्वल प्रतीत हो रही थी। बर्फसदृश निर्मल यशवाले राजा पुरूरवाने उस नदीको देखा॥ १०—१९॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे मद्रेश्वरस्य तपोवनागमनं नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें तपोवनागमन नामक एक सौ पंद्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। ॥ ११५ ॥


एक सौ सोलहवाँ अध्याय

ऐरावती नदीका वर्णन

सूत उवाच<br>स ददर्श नदीं पुण्यां दिव्यां हैमवतीं शुभाम्।<br>गन्धर्वैश्च समाकीर्णां नित्यं शक्रेण सेविताम्॥ १<br>सुरेभमदसं सिक्तां समंतात् तु विराजिताम्।<br>मध्येन शक्रचापाभां तस्मिन्नहनि सर्वदा॥ २**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! वह मङ्गलकारिणी एवं पुण्यमयी दिव्य नदी ऐरावती हिमालयपर्वतसे निकली हुई थी। वह (जलक्रीडार्थ आये हुए) गन्धर्वोंसे भरी हुई, इन्द्रद्वारा सदा सेवित, चारों ओरसे ऐरावतके मद-जलसे अभिषिक्त होनेके कारण सुशोभित और मध्यमें