मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय ९ * | ३९ |
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| हिरण्यरोमाणमुदग्दिगीशं<br> प्रजापतिर्देवसुतं चकार।<br>अद्यापि कुर्वन्ति दिशामधीशाः<br> शत्रून् दहन्तस्तु भुवोऽभिरक्षाम्॥ ११॥<br>चतुर्भिरेभिः पृथुनामधेयो<br> नृपोऽभिषिक्तः प्रथमं पृथिव्याम्।<br>गतेऽन्तरे चाक्षुषनामधेये<br> वैवस्वताख्ये च पुनः प्रवृत्ते।<br>प्रजापतिः सोऽस्य चराचरस्य<br> बभूव सूर्यान्वयवंशचिह्नः॥ १२॥ | प्रजापति ब्रह्माने देवपुत्र हिरण्यरोमाको उत्तर दिशाका स्वामित्व प्रदान किया। ये दिक्पालगण आज भी शत्रुओंको सन्तप्त करते हुए पृथिवीकी सब ओरसे रक्षा करते हैं। इन्हीं चारों दिक्पालोंद्वारा पहले-पहल भूतलपर पृथु नामके नरेश अभिषिक्त हुए थे। चाक्षुष-मन्वन्तरकी समाप्तिके बाद पुनः वैवस्वतमन्वन्तरके प्रारम्भ होनेपर सूर्यवंशके चिह्नस्वरूप ये राजा पृथु इस चराचर जगत्के प्रजापति हुए थे॥ ११-१२॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणेऽधिपत्याभिषेचनं नामाष्टमोऽध्यायः॥ ८॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके आदिसर्गमें आधिपत्याभिषेचन नामक आठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ ८॥
नवाँ अध्याय
मन्वन्तरोंके चौदह देवताओं और सप्तर्षियोंका विवरण
| सूत उवाच | सूतजी कहते हैं—ऋषियो! इस प्रकार सृष्टि-सम्बन्धी वर्णन सुनकर मनुने भगवान् जनार्दनसे पुनः निवेदन किया—मधुसूदन! अब पूर्वमें उत्पन्न हुए मनुओंके चरित्रका वर्णन कीजिये॥ १॥ |
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| एवं श्रुत्वा मनुः प्राह पुनरेव जनार्दनम्।<br>पूर्वेषां चरितं ब्रूहि मनूनां मधुसूदन॥ १<br><br>मत्स्य उवाच<br>मन्वन्तराणि राजेन्द्र मनूनां चरितं च यत्।<br>प्रमाणं चैव कालस्य तां सृष्टिं च समासतः॥ २<br>एकचित्तः प्रशान्तात्मा शृणु मार्तण्डनन्दन।<br>यामा नाम पुरा देवा आसन् स्वायम्भुवान्तरे॥ ३<br>सप्तैव ऋषयः पूर्वे ये मरीच्यादयः स्मृताः।<br>आग्नीध्रश्चाग्निबाहुश्च सहः सवन एव च॥ ४<br>ज्योतिष्मान् द्युतिमान् हव्यो मेधा मेधातिथिर्वसुः।<br>स्वायम्भुवस्यास्य मनोर्दशैते वंशवर्धनाः॥ ५<br>प्रतिसर्गमिमे कृत्वा जग्मुर्यत् परमं पदम्।<br>एतत् स्वायम्भुवं प्रोक्तं स्वारोचिषमतः परम्॥ ६<br>स्वारोचिषस्य तनयाश्चत्वारो देववर्चसः।<br>नभोनभस्यप्रसृतिभानवः कीर्तिवर्धनाः॥ ७ | मत्स्यभगवान् कहने लगे—राजेन्द्र! अब मैं मन्वन्तरोंको, मनुओंके सम्पूर्ण चरित्रको, उनमें प्रत्येकके शासनकालको और उनके समयकी सृष्टिके वृत्तान्तको संक्षेपमें वर्णन कर रहा हूँ; तुम उसे एकाग्रचित्त एवं प्रशान्त मनसे श्रवण करो। मार्तण्डनन्दन! प्राचीनकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें याम नामक देवगण थे। मरीचि (अत्रि) आदि मुनि ही सप्तर्षि थे। इन स्वायम्भुव मनुके आग्नीध्र, अग्निबाहु, सह, सवन, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हव्य, मेधा, मेधातिथि और वसु नामके दस पुत्र थे, जिनसे वंशका विस्तार हुआ। ये सभी प्रतिसर्गकी रचना करके परमपदको प्राप्त हुए। यह स्वायम्भुव-मन्वन्तरका वर्णन हुआ। अब इसके पश्चात् स्वारोचिष मनुका वृत्तान्त सुनो। स्वारोचिष मनुके नभ, नभस्य, प्रसृति और भानु—ये चार पुत्र थे, जो सभी देवताओंके सदृश वर्चस्वी और कीर्तिका विस्तार करनेवाले थे। |