भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय १४० *५०७
गृहप्रतापैः क्वथितं समन्तात्<br>तदार्णवे तोयमुदीर्णवेगम्।<br>वित्रासयामास तिमीन् सनक्रां -<br>स्तिमिङ्गिलांस्तक्वथितांस्तथान्यान्॥ ७२<br>सगोपुरो मन्दरपादकल्पः<br>प्राकारवर्यस्त्रिपुरे च सोऽथ।<br>तैरैव सार्धं भवनैः पपात<br>शब्दं महान्तं जनयन् समुद्रे॥ ७३<br>सहस्रशृङ्गैर्भवनैर्यदासीत्<br>सहस्रशृङ्गः स इवाचलेशः।<br>नामावशेषं त्रिपुरं प्रजज्ञे<br>हुताशनाहारबलिप्रयुक्तम् ॥ ७४<br>प्रदह्यमानेन पुरेण तेन<br>जगत्सपातालदिवं प्रतप्तम्।<br>दुःखं महत्प्राप्य जलावमग्नं<br>हित्वा महान् सौधवरो मयस्य॥ ७५<br>तद् देवेशो वचः श्रुत्वा इन्द्रो वज्रधरस्तदा।<br>शशाप तद्गृहं चापि मयस्यादितिनन्दनः॥ ७६<br>असेव्यमप्रतिष्ठं च भयेन च समावृतम्।<br>भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथानलः॥ ७७<br>यस्य यस्य तु देशस्य भविष्यति पराभवः।<br>द्रक्ष्यन्ति त्रिपुरं खण्डं तत्रेदं नाशगा जनाः।<br>तदेतदद्यापि गृहं मयस्यामयवर्जितम्॥ ७८उस समय समुद्रमें चारों ओर गिरते हुए गृहोंकी उष्णतासे खौलते हुए जलमें तूफान आ गया, जिससे मगरमच्छ, नाक, तिमिंगिल तथा अन्यान्य जलजन्तु संतप्त होकर भयभीत हो उठे। उसी समय त्रिपुरमें लगा हुआ मन्दराचलके समान ऊँचा परकोटा फाटकसहित उन गिरते हुए भवनोंके साथ-ही-साथ महान् शब्द करता हुआ समुद्रमें जा गिरा। जो त्रिपुर थोड़ी देर पहले सहस्रों ऊँचे-ऊँचे भवनोंसे युक्त होनेके कारण सहस्र शिखरवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था वही अग्निके आहार और बलिके रूपमें प्रयुक्त होकर नाममात्र अवशेष रह गया। जलते हुए उस त्रिपुरके तापसे पाताल और स्वर्गलोकसहित सारा जगत् संतप्त हो उठा। इस प्रकार महान् कष्ट झेलता हुआ वह त्रिपुर समुद्रके जलमें निमग्न हो गया। इसमें एकमात्र मयका महान् भवन ही बच गया था। अदिति-नन्दन वज्रधारी देवराज इन्द्रने जब ऐसी बात सुनी तो मयके उस गृहको शाप देते हुए बोले—'मयका वह गृह किसीके सेवन करनेयोग्य नहीं होगा। उसकी संसारमें प्रतिष्ठा नहीं होगी। वह अग्निकी तरह सदा भयसे युक्त बना रहेगा। जिस-जिस देशकी पराजय होनेवाली होगी उस-उस देशके विनाशोन्मुख निवासी इस त्रिपुर-खण्डका दर्शन करेंगे।' मयका वह गृह आज भी आपत्तियोंसे रहित है॥ ६८–७८॥
ऋषय ऊचुः<br>भगवन् स मयो येन गृहेण प्रपलायितः।<br>तस्य नो गतिमाख्याहि मयस्य चमसोद्भव ॥ ७९ऋषियोंने पूछा— चमससे उत्पन्न होनेवाले ऐश्वर्यशाली सूतजी ! वह मय जिस गृहको साथ लेकर भाग गया था, उस मयकी आगे चलकर क्या गति हुई ? यह हमें बतलाइये ॥ ७९ ॥
सूत उवाच<br>दृश्यते दृश्यते यत्र ध्रुवस्तत्र मयास्पदम्।<br>देवद्विट् तु मयश्चातः स तदा खिन्नमानसः।<br>ततश्च युतोऽन्यलोकेऽस्मिंस्त्राणार्थं स चकार सः॥ ८०<br>तत्रापि देवताः सन्ति आप्तोर्यामाः सुरोत्तमाः।<br>तत्राशक्तं ततो गन्तुं तं चैकं पुरमुत्तमम् ॥ ८१सूतजी कहते हैं— ऋषियो ! जहाँ ध्रुव दिखलायी पड़ते हैं वहीं मयका भी स्थान दीख पड़ता था, किंतु कुछ समयके बाद देवशत्रु मयका मन खिन्न हो गया, तब वह अपनी रक्षाके निमित्त वहाँसे हटकर अन्य लोकमें चला गया। वहाँ भी आप्तोर्याम नामक श्रेष्ठ देवता निवास करते थे, परंतु अब मयमें वहाँसे अन्यत्र जानेकी शक्ति नहीं रह गयी थी।