मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १४२ * | ५१७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अष्टौ शतसहस्त्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु।<br>चतुःषष्टिसहस्त्राणि वर्षाणां द्वापरं युगम्॥ २६<br>चत्वारि नियुतानि स्युर्वर्षाणि तु कलियुगम्।<br>द्वात्रिंशच्च तथान्यानि सहस्राणि तु संख्यया।<br>एतत् कलियुगं प्रोक्तं मानुषेण प्रमाणतः॥ २७<br>एषा चतुर्युगावस्था मानुषेण प्रकीर्तिता।<br>चतुर्युगस्य संख्याता संध्या संध्यांशकैः सह॥ २८ | अट्ठाईस हजार वर्षोंका कहा जाता है। इसी मानुष-गणनाके अनुसार त्रेतायुगकी वर्ष-संख्या बारह लाख छानबे हजार बतलायी गयी है। द्वापरयुग आठ लाख चौंसठ हजार मानुष वर्षोंका होता है। मानुषगणनाके अनुसार कलियुगका मान चार लाख बत्तीस हजार वर्षोंका कहा गया है। चारों युगोंकी यह अवस्था मानव-गणनाके अनुसार बतलायी गयी है। इस प्रकार संध्या और संध्यांशसहित चारों युगोंकी संख्या बतलायी जा चुकी॥ २१—२८॥ |
| एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका त्वेकसप्ततिः।<br>कृतत्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरमुच्यते॥ २९<br>मन्वन्तरस्य संख्या तु मानुषेण निबोधत।<br>एकत्रिंशत् तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः॥ ३०<br>तथा शतसहस्राणि दश चान्यानि भागशः।<br>सहस्राणि तु द्वात्रिंशच्छतान्यष्टाधिकानि च॥ ३१<br>आशीतिश्चैव वर्षाणि मासांश्चैवाधिकास्तु षट्।<br>मन्वन्तरस्य संख्यैषा मानुषेण प्रकीर्तिता॥ ३२<br>दिव्येन च प्रमाणेन प्रवक्ष्याम्यन्तरं मनोः।<br>सहस्त्राणां शतान्याहुः स च वै परिसंख्यया॥ ३३<br>चत्वारिंशत् सहस्राणि मनोरन्तरमुच्यते।<br>मन्वन्तरस्य कालस्तु युगैः सह परिकीर्तितः॥ ३४<br>एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका ह्येकसप्ततिः।<br>क्रमेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते॥ ३५<br>एतच्चतुर्दशगुणं कल्पमाहुस्तु तद्विदः।<br>ततस्तु प्रलयः कृत्स्नः स तु सम्प्रलयो महान्॥ ३६<br>कल्पप्रमाणे द्विगुणो यथा भवति संख्यया।<br>चतुर्युगाख्या व्याख्याता कृतं त्रेतायुगं च वै॥ ३७<br>त्रेतासृष्टिं प्रवक्ष्यामि द्वापरं कलिमेव च।<br>युगपत्समवेतौ द्वौ द्विधा वक्तुं न शक्यते॥ ३८<br>क्रमागतं मयाप्येतत् तुभ्यं नोक्तं युगद्वयम्।<br>ऋषिवंशप्रसङ्गेन व्याकुलत्वात् तथा क्रमात्॥ ३९<br>नोक्तं त्रेतायुगे शेषं तद्वक्ष्यामि निबोधत। | (अब मन्वन्तरका वर्णन करते हैं।) इन कृतयुग, त्रेता आदि युगोंकी यह चौकड़ी जब एकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वन्तर कहते हैं। अब मन्वन्तरकी वर्षसंख्या मानुषगणनाके अनुसार सुनिये। मानव-वर्षके अनुसार एक मन्वन्तरकी वर्ष-संख्या इकतीस करोड़ दस लाख बत्तीस हजार आठ सौ अस्सी वर्ष छः महीनेकी बतलायी जाती है। अब मैं दिव्य गणनाके अनुसार मन्वन्तरका वर्णन कर रहा हूँ। एक मनुका कार्यकाल एक लाख चालीस हजार दिव्य वर्षोंका बतलाया जाता है। मन्वन्तरका समय युग-वर्णनके साथ ही कहा जा चुका है। चारों युगोंकी यह चौकड़ी जब क्रमशः एकहत्तर बार बीत जाती है, तब उसे एक मन्वन्तर कहते हैं। कालतत्त्वको जाननेवाले विद्वान् मन्वन्तरके चौदह गुने कालको एक कल्प बतलाते हैं। इसके बाद सारी सृष्टिका विनाश हो जाता है, जिसे महाप्रलय कहते हैं। महाप्रलयका समय कल्पके समयसे दुगुना होता है। इस प्रकार कृतयुग, त्रेता आदि चारों युगोंकी वर्ष-संख्या बतलायी जा चुकी। अब मैं त्रेता, द्वापर और कलियुगकी सृष्टिका वर्णन कर रहा हूँ। कृतयुग और त्रेता—ये दोनों परस्पर सम्बद्ध हैं, अतः इनका पृथक् रूपसे वर्णन नहीं किया जा सकता। इसी कारण इन दोनों युगोंके वर्णनका अवसर क्रमशः प्राप्त होनेपर भी मैंने आपलोगोंसे नहीं कहा। साथ ही उस समय ऋषि-वंशका प्रसङ्ग छिड़ जानेपर चित्त व्याकुल हो उठा था। उस समय जो नहीं कहा था, वह शेषांश अब त्रेतायुगके वर्णन-प्रसङ्गमें कह रहा हूँ, सुनिये॥ २९—३९ १/२॥ |