भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 533

* अध्याय १४३ * ५२३

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मान्न निश्चयाद्वक्तुं धर्मः शक्यो हि केनचित्।<br>देवानृषीनुपादाय स्वायम्भुवमृते मनुम्॥ २८<br>तस्मान्न हिंसा यज्ञे स्याद् यदुक्तमृषिभिः पुरा।<br>ऋषिकोटिसहस्राणि स्वैस्तपोभिर्दिवं गताः॥ २९<br>तस्मान्न हिंसायज्ञं च प्रशंसन्ति महर्षयः।<br>उञ्छो मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः॥ ३०<br>एतद् दत्त्वा विभवतः स्वर्गलोके प्रतिष्ठिताः।<br>अद्रोहश्चाप्यलोभश्च दमो भूतदया शमः॥ ३१<br>ब्रह्मचर्यं तपः शौचमनुक्रोशं क्षमा धृतिः।<br>सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतदुरासदम्॥ ३२<br>द्रव्यमन्त्रात्मको यज्ञस्तपश्च समतात्मकम्।<br>यज्ञैश्च देवानाप्नोति वैराजं तपसा पुनः॥ ३३<br>ब्रह्मणः कर्मसंन्यासाद्वैराग्यात् प्रकृतेर्लयम्।<br>ज्ञानात्प्राप्नोति कैवल्यं पञ्चैता गतयः स्मृताः॥ ३४और दुर्गम है। अतः देवताओं और ऋषियोंके साथ-साथ स्वायम्भुव मनुके अतिरिक्त अन्य कोई भी अकेला व्यक्ति धर्मके विषयमें निश्चयपूर्वक निर्णय नहीं दे सकता। इसलिये पूर्वकालमें जैसा ऋषियोंने कहा है, उसके अनुसार यज्ञमें जीव-हिंसा नहीं होनी चाहिये। हजारों करोड़ ऋषि अपने तपोबलसे स्वर्गलोकको गये हैं। इसी कारण महर्षिगण हिंसात्मक यज्ञकी प्रशंसा नहीं करते। वे तपस्वी अपनी सम्पत्तिके अनुसार उञ्छवृत्तिसे प्राप्त हुए अन्न, मूल, फल, शाक और कमण्डलु आदिका दान कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हुए हैं। ईर्ष्याहीनता, निर्लोभता, इन्द्रियनिग्रह, जीवोंपर दयाभाव, मानसिक स्थिरता, ब्रह्मचर्य, तप, पवित्रता, करुणा, क्षमा और धैर्य—ये सनातन धर्मके मूल ही हैं, जो बड़ी कठिनतासे प्राप्त किये जा सकते हैं। यज्ञ द्रव्य और मन्त्रद्वारा सम्पन्न किये जा सकते हैं और तपस्याकी सहायिका समता है। यज्ञोंसे देवताओंकी तथा तपस्यासे विराट् ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। कर्म (फल)-का त्याग कर देनेसे ब्रह्म-पदकी प्राप्ति होती है, वैराग्यसे प्रकृतिमें लय होता है और ज्ञानसे कैवल्य (मोक्ष) सुलभ हो जाता है। इस प्रकार ये पाँच गतियाँ बतलायी गयी हैं॥ २७-३४॥
एवं विवादः सुमहान् यज्ञस्यासीत् प्रवर्त्तने।<br>ऋषीणां देवतानां च पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे॥ ३५<br>ततस्ते ऋषयो दृष्ट्वा हतं धर्मं बलेन तु।<br>वसोर्वाक्यमनादृत्य जग्मुस्ते वै यथागतम्॥ ३६<br>गतेषु ऋषिषङ्घेषु देवा यज्ञमवाप्नुयुः।<br>श्रूयन्ते हि तपःसिद्धा ब्रह्मक्षत्रादयो नृपाः॥ ३७<br>प्रियव्रतोत्तानपादौ ध्रुवो मेधातिथिर्वसुः।<br>सुधामा विरजाश्चैव शंखपाद्राजसस्तथा॥ ३८<br>प्राचीनबर्हिः पर्जन्यो हविर्धानादयो नृपाः।<br>एते चान्ये च बहवस्ते तपोभिर्दिवं गताः॥ ३९<br>राजर्षयो महात्मानो येषां कीर्तिः प्रतिष्ठिता।<br>तस्माद्विशिष्यते यज्ञात्तपः सर्वैस्तु कारणैः॥ ४०<br>ब्रह्मणा तपसा सृष्टं जगद्विश्वमिदं पुरा।<br>तस्मान्नाप्नोति तद् यज्ञात्तपोमूलमिदं स्मृतम्॥ ४१पूर्वकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें यज्ञकी प्रथा प्रचलित होनेके अवसरपर देवताओं और ऋषियोंके बीच इस प्रकारका महान् विवाद हुआ था। तदनन्तर जब ऋषियोंने यह देखा कि यहाँ तो बलपूर्वक धर्मका विनाश किया जा रहा है, तब वसुके कथनकी उपेक्षा कर वे जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उन ऋषियोंके चले जानेपर देवताओंने यज्ञकी सारी क्रियाएँ सम्पन्न कीं। इसके अतिरिक्त इस विषयमें ऐसा भी सुना जाता है कि बहुतेरे ब्राह्मण तथा क्षत्रियनरेश तपस्याके प्रभावसे ही सिद्धि प्राप्त की थी। प्रियव्रत, उत्तानपाद, ध्रुव, मेधातिथि, वसु, सुधामा, विरजा, शङ्खपाद्, राजस, प्राचीनबर्हि, पर्जन्य और हविर्धान आदि नृपतिगण तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से नरेश तपोबलसे स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं, जिन महात्मा राजर्षियोंकी कीर्ति अबतक विद्यमान है। अतः तपस्या सभी कारणोंसे सभी प्रकार यज्ञसे बढ़कर है। पूर्वकालमें ब्रह्माने तपस्याके प्रभावसे ही इस सारे जगत्की सृष्टि की थी, अतः यज्ञद्वारा वह बल नहीं प्राप्त हो सकता। उसकी प्राप्तिका मूल कारण तप