भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 547
* अध्याय १४५ *५३७
यथान्धकारे खद्योतः सहसा सम्प्रदृश्यते।<br>तथा निवृत्तो ह्याव्यक्तः खद्योत इव सञ्ज्वलन्॥ ७३<br>स महात्मा शरीरस्थस्तत्रैव परिवर्तते।<br>महत्तस्तमसः पारे वैलक्षण्याद् विभाव्यते॥ ७४<br>तत्रैव संस्थितो विद्वांस्तपसोऽन्त इति श्रुतम्।<br>बुद्धिर्विवर्धतस्तस्य प्रादुर्भूता चतुर्विधा॥ ७५<br>ज्ञानं वैराग्यमैश्वर्यं धर्मश्चेति चतुष्टयम्।<br>सांसिद्धिकान्यथैतानि अप्रतीतानि तस्य वै॥ ७६<br>महात्मनः शरीरस्य चैतन्यात् सिद्धिरुच्यते।<br>पुरि शेते यतः पूर्वं क्षेत्रज्ञानं तथापि च॥ ७७<br>पुरे शयानात् पुरुषः ज्ञानात् क्षेत्रज्ञ उच्यते।<br>यस्माद् धर्मात् प्रसूते हि तस्माद् वै धार्मिकः स्मृतः॥ ७८<br>सांसिद्धिके शरीरे च बुद्ध्याव्यक्तस्तु चेतनः।<br>एवं विवृत्तः क्षेत्रज्ञः क्षेत्रं ह्यनभिसंधितः॥ ७९<br>निवृत्तिसमकाले तु पुराणं तदचेतनम्।<br>क्षेत्रज्ञेन परिज्ञातं भोग्योऽयं विषयो मम॥ ८०जैसे घने अन्धकारमें सहसा जुगनू चमक उठता है, वैसे ही जुगनूकी तरह चमकता हुआ अव्यक्त प्रकट हो जाता है। वह महात्मा अव्यक्त शरीरमें ही स्थित रहता है और महान् अन्धकारको पार करके बड़ी विलक्षणतासे जाना जाता है। वह विद्वान् अव्यक्त अपनी तपस्याके अन्त समयतक वहीं स्थित रहता है, ऐसा सुना जाता है। वृद्धिको प्राप्त होते हुए उस अव्यक्तके हृदयमें चार प्रकारकी बुद्धि प्रादुर्भूत होती है। उन चारोंके नाम हैं—ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य और धर्म। उस अव्यक्तके ये प्राकृतिक कर्म अगम्य हैं। महात्मा अव्यक्तके शरीरके चैतन्यसे सिद्धिका प्रादुर्भाव बतलाया जाता है। चूँकि वह पहले-पहल शरीरमें शयन करता है तथा उसे क्षेत्रका ज्ञान प्राप्त रहता है, इसलिये वह शरीरमें शयन करनेसे पुरुष और क्षेत्रका ज्ञान होनेसे क्षेत्रज्ञ कहलाता है। चूँकि वह धर्मसे उत्पन्न होता है, इसलिये उसे धार्मिक भी कहते हैं। प्राकृतिक शरीरमें बुद्धिका संयोग होनेसे वह अव्यक्त चेतन कहलाता है तथा क्षेत्रसे कोई प्रयोजन न होनेपर भी उसे क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। निवृत्तिके समय क्षेत्रज्ञ उस अचेतन पुराणपुरुषको जानता है कि यह मेरा भोग्य विषय है॥ ६८–८० ॥
ऋषिर्हिंसागतौ धातुर्विद्या सत्यं तपः श्रुतम्।<br>एष संनिचयो यस्मात् ब्रह्मणस्तु ततस्त्वृषिः॥ ८१<br>निवृत्तिसमकालाच्च बुद्ध्याव्यक्त ऋषिस्त्वयम्।<br>ऋषते परमं यस्मात् परमर्षिस्ततः स्मृतः॥ ८२<br>गत्यर्थाद् ऋषतेर्धातार्नामनिवृत्तिकारणम्।<br>यस्मादेष स्वयम्भूतस्तस्माच्च ऋषिता मता॥ ८३<br>सेश्वराः स्वयमुद्भूता ब्रह्मणो मानसाः सुताः।<br>निवर्तमानैस्तैर्बुद्ध्या महान् परिगतः परः॥ ८४<br>यस्मादृषिर्महत्त्वेन ज्ञेयास्तस्मान्महर्षयः।<br>ईश्वराणां सुतास्तेषां मानसाश्चौरसाश्च वै॥ ८५<br>ऋषिस्तस्मात् परत्वेन भूतादिऋषयस्ततः।<br>ऋषिपुत्रा ऋषीकास्तु मैथुनाद् गर्भसम्भवाः॥ ८६<br>परत्वेन ऋषन्ते वै भूतादीन् ऋषिकास्ततः।<br>ऋषीकाणां सुता ये तु विज्ञेया ऋषिपुत्रकाः॥ ८७'ऋषि' धातुका हिंसा और गति-अर्थमें प्रयोग होता है। इसीसे 'ऋषि' शब्द निष्पन्न हुआ है। चूँकि उसे ब्रह्मासे विद्या, सत्य, तप, शास्त्र-ज्ञान आदि समूहोंकी प्राप्ति होती है, इसलिये उसे ऋषि कहते हैं। यह अव्यक्त ऋषि निवृत्तिके समय जब बुद्धि-बलसे परमपदको प्राप्त कर लेता है, तब वह परमर्षि कहलाता है। गत्यर्थक* 'ऋषी' धातुसे ऋषिनामकी निष्पत्ति होती है तथा वह स्वयं उत्पन्न होता है, इसलिये उसकी ऋषिता मानी गयी है। ब्रह्माके मानस पुत्र ऐश्वर्यशाली वे ऋषि स्वयं उत्पन्न हुए हैं। निवृत्तिमार्गमें लगे हुए वे ऋषि बुद्धिबलसे परम महान् पुरुषको प्राप्त कर लेते हैं। चूँकि वे ऋषि महान् पुरुषत्वसे युक्त रहते हैं, इसलिये महर्षि कहे जाते हैं। उन ऐश्वर्यशाली महर्षियोंको जो मानस एवं औरस पुत्र हुए, वे ऋषिपरक होनेके कारण प्राणियोंमें सर्वप्रथम ऋषि कहलाये। मैथुनद्वारा गर्भसे उत्पन्न हुए ऋषि-पुत्रोंको ऋषीक कहा जाता है। चूँकि ये जीवोंको ब्रह्मपरक बनाते हैं, इसलिये इन्हें ऋषिक कहा जाता है। ऋषिकके पुत्रोंको ऋषि-पुत्र जानना

* गतिके ज्ञान, मोक्ष और गमन यहाँ तीनों अर्थ विवक्षित हैं।