मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| रुचिराङ्गदनद्धाङ्गं महासिंहासने स्थितम्।<br>वीजयन्त्यप्सरःश्रेष्ठा भृशं मुञ्चन्ति नैव ताः॥ २९<br><br>चन्द्राकौ दीपमार्गेषु व्यजनेषु च मारुतः।<br>कृतान्तोऽग्रेसरस्तस्य बभूवुर्मुुनिसत्तमाः॥ ३०<br><br>एवं प्रयाति काले तु वितते तारकासुरः।<br>बभाषे सचिवान् दैत्यः प्रभूतवरदर्पितः॥ ३१<br><br>तारक उवाच | और मनोहर बाजूबंद बाँधकर विशाल सिंहासनपर बैठता तब श्रेष्ठ अप्सराएँ उसपर निरन्तर पंखा झलती रहती थीं और क्षणमात्रके लिये भी उससे पृथक् नहीं होती थीं। मुनिवरो! उसके महलमें चन्द्रमा और सूर्य दीपके स्थानपर, वायुदेव पंखोंके स्थानपर तथा कृतान्त उसके अग्रेसरके स्थानपर नियुक्त हुए। इस प्रकार (सुखपूर्वक) बहुत-सा समय व्यतीत हो जानेपर एक दिन उत्कृष्ट वरप्राप्तिसे गर्वित हुआ दैत्यराज तारकासुर अपने मन्त्रियोंसे बोला॥ २६-३१॥<br><br>तारकने कहा— अमात्यो! स्वर्गलोकपर आक्रमण | | राज्येन कारणं किं मे त्वनाक्रम्य त्रिविष्टपम्।<br>अनिर्याप्य सुरैर्वैरं का शान्तिर्हृदये मम॥ ३२ | किये बिना मुझे इस राज्यसे क्या लाभ? देवताओंसे वैरका बदला चुकाये बिना मेरे हृदयमें शान्ति कहाँ? | | भुञ्जतेऽद्यापि यज्ञांशानमरा नाक एव हि।<br>विष्णुः श्रियं न जहाति तिष्ठते च गतभ्रमः॥ ३३ | अभी भी देवगण स्वर्गलोकमें यज्ञांशोंका उपभोग कर रहे हैं। विष्णु लक्ष्मीको नहीं छोड़ रहा है और निर्भय होकर स्थित है। | | स्वस्थाभिः स्वर्गनारीभिः पीड्यन्तेऽमरवल्लभाः।<br>सोत्पला मदिरामोदा दिवि क्रीडायनेषु च॥ ३४ | स्वर्गलोकमें क्रीडागारोंमें मदिराकी गन्धसे युक्त दुबले-पतले शरीरवाले श्रेष्ठ देवगण सुन्दरी देवाङ्गनाओंद्वारा आलिङ्गित किये जा रहे हैं। | | लब्ध्वा जन्म न यः कश्चिद् घटयेत् पौरुषं नरः।<br>जन्म तस्य वृथाभूतमजन्मा तु विशिष्यते॥ ३५ | कोई भी व्यक्ति यदि जन्म लेकर अपना पुरुषार्थ नहीं प्रकट करता तो उसका जन्म लेना व्यर्थ है, उससे तो जन्म न लेनेवाला ही विशिष्ट है। | | मातापितृभ्यां न करोति कामान्<br>बन्धूनशोकान् न करोति यो वा।<br>कीर्तिं हि वा चार्जंयते हिमाभां<br>पुमान् स जातोऽपि मृतो मतं मे॥ ३६ | जो पुरुष माता-पिताकी कामनाओंको पूर्ण नहीं करता, अपने बन्धुओंका शोक नष्ट नहीं करता और हिमके समान उज्ज्वल कीर्तिका अर्जन नहीं करता, वह जन्म लेकर भी मरे हुएके समान है—ऐसा मेरा विचार है। | | तस्माज्जयायामरपुङ्गवानां<br>त्रैलोक्यलक्ष्मीहरणाय शीघ्रम्।<br>संयोज्यतां मे रथमष्टचक्रं<br>बलं च मे दुर्जयदैत्यचक्रम्।<br>ध्वजं च मे काञ्चनपट्टनद्धं<br>छत्रं च मे मौक्तिकजालबद्धम्॥ ३७ | इसलिये श्रेष्ठ देवताओंको जीतने तथा त्रिलोकीकी लक्ष्मीका अपहरण करनेके लिये शीघ्र ही मेरा आठ पहियेवाला रथ, अजेय दैत्य-सैन्यसमूह, स्वर्णपत्र-जटित ध्वज और मुक्ताकी लड़ियोंसे सुशोभित छत्र तैयार किया जाय॥ ३२-३७॥ | | तारकस्य वचः श्रुत्वा ग्रसनो नाम दानवः।<br>सेनानीर्दैत्यराजस्य तथा चक्रे बलान्वितः॥ ३८ | दैत्यराज तारककी बात सुनकर उसके सेनानायक महाबली ग्रसन नामक दानवने उसके आज्ञानुसार |