मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय १५० * <span style="float: right;">५६१</span>
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जम्भो रुषा तमायान्तं दानवानीकसंवृतः ।<br>उवाच प्राज्ञो वाक्यं तु यथा स्निग्धेन भाषितम् ॥ १३<br><br>ग्रसनो लब्धसंज्ञोऽथ यमस्य प्राहिणोद् गदाम् ।<br>मणिहेमपरिष्कारां गुर्वीमरिविमर्दिनीम् ॥ १४<br><br>तामप्रतर्क्यां सम्प्रेक्ष्य गदां महिषवाहनः ।<br>गदायाः प्रतिघातार्थं जगद्दलनभैरवम् ॥ १५<br><br>दण्डं मुमोच कोपेन ज्वालामालासमाकुलम् ।<br>स गदां वियति प्राप्य ररासाम्बुधरो यथा ॥ १६<br><br>संघट्टमभवत् ताभ्यां शैलाभ्यामिव दुःसहम् ।<br>ताभ्यां निष्पेषनिर्ह्रादजडीकृतदिगन्तरम् ॥ १७<br><br>जगद् व्याकुलतां यातं प्रलयागमशङ्कया ।<br>क्षणात् प्रशान्तनिर्ह्रादं ज्वलदुल्कासमाहितम् ॥ १८<br><br>निष्पेषेण तयोर्भीममभूद् गमनगोचरम् ।<br>निहत्याथ गदां दण्डस्ततो ग्रसनमूर्धनि ॥ १९<br><br>हृत्वा श्रियमिवानर्थो दुर्वृत्तस्यापतद् दृढः ।<br>स तु तेन प्रहारेण दृष्ट्वा सतिमिरा दिशः ॥ २०<br><br>पपात भूमौ निःसंज्ञो भूमिरेणुविभूषितः ।<br>ततो हाहारवो घोरः सेनयोरुभयोरभूत् ॥ २१ | तब क्रोधपूर्वक कुबेरको आक्रमण करते देखकर दानवोंकी सेनासे घिरा हुआ बुद्धिमान् जम्भ प्रेमीद्वारा कही गयी मधुर वाणीकी तरह वचन बोला। इतनेमें ही ग्रसनकी चेतना लौट आयी। फिर तो उसने यमराजपर ऐसी गदाका प्रहार किया, जो बड़ी वजनदार थी, जिसमें मणि और सुवर्ण जड़े हुए थे तथा जो शत्रुओंका विनाश करनेवाली थी। उस अप्रत्याशित गदाको अपनी ओर आती देखकर महिषवाहन यमराजने क्रोधपूर्वक उस गदाका प्रतिरोध करनेके लिये अपने उस दण्डको छोड़ दिया, जो संसारका विनाश करनेमें समर्थ और अत्यन्त भयंकर था तथा जिससे अग्निके समान लपटें निकल रही थीं। वह दण्ड आकाशमें गदासे टकराकर मेघकी-सी गर्जना करने लगा। फिर तो दण्ड और गदामें दो पर्वतोंकी भाँति दुःसह संघर्ष छिड़ गया। उन दोनों अस्त्रोंके टक्करसे उत्पन्न हुए शब्दसे सारी दिशाएँ जड़ हो गयीं और जगत् प्रलयके आगमनकी आशङ्कासे व्याकुल हो गया। क्षणमात्र पश्चात् शब्द शान्त हो गया और उन दोनोंके मध्य जलती हुई उल्काके समान प्रकाश होने लगा। उन दोनोंके संघर्षसे आकाशमण्डल अत्यन्त भयंकर दीख रहा था। तदनन्तर दण्डने गदाको तोड़-मरोड़कर ग्रसनके मस्तकपर ऐसा कठोर आघात किया, जैसे दुराचारीका अनिष्ट उसकी श्रीका नाश करके उसे समाप्त कर देता है। उस प्रहारसे व्याकुल हुए ग्रसनको सारी दिशाएँ अन्धकारमयी दिखायी देने लगीं अर्थात् उसकी आँखों-तले अँधेरा छा गया। वह चेतनारहित होकर भूतलपर गिर पड़ा और उसका शरीर पृथ्वीकी धूलसे धूसरित हो गया। तत्पश्चात् दोनों सेनाओंमें भयंकर हाहाकार मच गया॥ १२-२१॥ |
| ततो मुहूर्तमात्रेण ग्रसनः प्राप्य चेतनाम् ।<br>अपश्यत् स्वां तनुं ध्वस्तां विलोलाभरणाम्बराम् ॥ २२<br><br>स चापि चिन्तयामास कृते प्रतिकृतिक्रियाम् ।<br>मद्विधे वस्तुनि पुंसि प्रभोः परिभवोदयाः ॥ २३<br><br>मय्याश्रितानि सैन्यानि जिते मयि विनाशिता ।<br>असम्भावित एवास्तु जनः स्वच्छन्दचेष्टितः ॥ २४ | तदनन्तर दो घड़ीके पश्चात् जब ग्रसनकी चेतना वापस लौटी तब उसने देखा कि उसका शरीर ध्वस्त हो गया है और उसके आभूषण तथा वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये हैं। फिर तो वह भी ऐसा करनेवालेसे बदला चुकानेका विचार करने लगा। वह मन-ही-मन सोचने लगा—मुझ-जैसे बली पुरुषके जीते-जी स्वामीके परिभवके लक्षण दिखायी पड़ रहे हैं। मेरे पराजित हो जानेपर मेरे आश्रित रहनेवाली सेनाएँ भी नष्ट हो जायेंगी। अयोग्य पुरुष ही स्वच्छन्दाचारी हो सकता है, |