भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १५० * ५७१

| रणेच्छां दूरतस्त्यक्त्वा तस्थुस्ते जीविता crowd... जीवितार्थिनः।<br>तत्राब्रवीत् कालनेमिर्दैत्यान् कोपेन दीपितः॥ १४०<br>भो भोः शृङ्गारिणः शूराः सर्वे शस्त्रास्त्रपारगाः।<br>एकैकोऽपि जगत्सर्वं शक्तस्तूलयितुं भुजैः॥ १४१<br>एकैकोऽपि क्षमो ग्रस्तुं जगत्सर्वं चराचरम्।<br>एकैकस्यापि पर्याप्ता न सर्वेऽपि दिवौकसः॥ १४२<br>कलां पूरयितुं यत्नात् षोडशीमतिविक्रमाः।<br>किं प्रयाताश्च तिष्ठध्वं समरेऽमरनिर्जिताः॥ १४३<br>न युक्तमेतच्छूराणां विशेषाद् दैत्यजन्मनाम्।<br>राजा चान्तरितोऽस्माकं तारको लोकमारकः॥ १४४<br>विरतानां रणादस्मात् क्रुद्धः प्राणान् हरिष्यति। | तब वे युद्धकी अभिलाषाको दूर छोड़कर जीवनकी रक्षाके लिये खड़े रहे। इसी बीच क्रोधसे उद्दीप्त हुए कालनेमिने दैत्योंको ललकारते हुए कहा—‘भो भो शृङ्गारसे सुसज्जित शूरवीरो! तुम सभी शस्त्रास्त्रके पारगामी विद्वान् हो। तुमलोगोंमेंसे एक-एक भी अपनी भुजाओंसे सारे जगत्‌को तौल सकता है तथा प्रत्येक व्यक्ति सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को निगल जानेमें समर्थ है। सब-के-सब प्रबल पराक्रमी देवता एक साथ मिलकर भी यत्नपूर्वक तुमलोगोंमेंसे किसी एककी सोलहवीं कलाकी समता नहीं कर सकते। फिर भी तुमलोग समरभूमिमें देवताओंसे पराजित होकर क्यों भागे जा रहे हो? ठहरो! ऐसा करना शूरवीरोंके लिये, विशेषतया दैत्यवंशियोंके लिये उचित नहीं है। सारे संसारका संहार करनेमें समर्थ हमलोगोंका राजा तारकासुर यहाँ उपस्थित नहीं है। वह क्रुद्ध होकर इस युद्धसे भागे हुए लोगोंके प्राणोंका हरण कर लेगा’॥ १३८—१४४ $\frac{१}{२}$ ॥ | | शीतेन नष्टश्रुतयो भ्रष्टवाक्पाटवास्तथा॥ १४५<br>मूकास्तदाभवन् दैत्या रणद्दशनपङ्क्तयः।<br>तान् दृष्ट्वा नष्टचेतस्कान् दैत्याञ्छीतेन सादितान्॥ १४६<br>मत्वा कालक्षमं कार्यं कालनेमिर्महासुरः।<br>आश्रित्य दानवीं मायां वितत्य स्वं महावपुः॥ १४७<br>पूरयामास गगनं दिशो विदिश एव च।<br>निर्ममे दानवेन्द्रेशः शरीरे भास्करायुतम्॥ १४८<br>दिशश्च मायया चण्डैः पूरयामास पावकैः।<br>ततो ज्वालाकुलं सर्वं त्रैलोक्यमभवत् क्षणात्॥ १४९<br>तेन ज्वालासमूहेन हिमांशुरगमच्छमम्।<br>ततः क्रमेण विभ्रष्टशीतदुर्दिनमाबभौ॥ १५०<br>तद् बलं दानवेन्द्राणां मायया कालनेमिनः।<br>तं दृष्ट्वा दानवानीकं लब्धसंज्ञं दिवाकरः।<br>उवाचारुणमुद्भ्रान्तः कोपाल्लोकैकलोचनः॥ १५१ | उस समय शीतके प्रभावसे उन दैत्योंकी श्रवणशक्ति और वाक्-चातुरी नष्ट हो गयी थी, वे मूक हो गये थे तथा उनके दाँत कटकटा रहे थे। महासुर कालनेमिने उन दैत्योंको इस प्रकार शीतद्वारा व्यथित और चेतनारहित देखकर इस कार्यको कालद्वारा प्रेरित माना। फिर तो उसने आसुरी मायाका आश्रय लेकर अपने विशाल शरीरका विस्तार किया और उससे आकाशमण्डल, दिशाओं और विदिशाओंको व्याप्त कर लिया। फिर उस दानवेन्द्रने अपने शरीरमें दस हजार सूर्योंका निर्माण किया। उसने मायाके बलसे दसों दिशाओंको प्रचण्ड अग्निसे पूर्ण कर दिया, जिससे क्षणमात्रमें सारी त्रिलोकी अग्निकी लपटोंसे व्याप्त हो गयी। उस ज्वालासमूहसे चन्द्रमा शान्त हो गये। तदनन्तर कालनेमिकी मायासे दानवेन्द्रोंकी वह सेना क्रमशः शीतरूपी दुर्दिनके नष्ट हो जानेपर शोभा पाने लगी। इस प्रकार दानवोंकी सेनाको चेतनायुक्त देखकर जगत्‌के एकमात्र नेत्रस्वरूप सूर्य क्रोधसे तिलमिला उठे, तब उन्होंने अरुणसे कहा॥ १४५—१५१॥ | | दिवाकर उवाच<br>नयारुण रथं शीघ्रं कालनेमिरथो यतः।<br>विमर्दस्तत्र विषमो भविता शूरसंक्षयः॥ १५२<br>जित एष शशाङ्कोऽत्र तद्बलं बलमाश्रितम्।<br>इत्युक्तश्चोदयामास रथं गरुडपूर्वजः॥ १५३ | **सूर्य बोले—**अरुण! मेरे रथको शीघ्र वहाँ ले चलो जहाँ कालनेमिका रथ खड़ा है। वहाँ (मेरा उसके साथ) शूरवीरोंका विनाश करनेवाला भीषण संग्राम होगा। जिनके बलपर हमलोग निर्भर थे, वे चन्द्रदेव तो इस युद्धमें परास्त हो गये। इस प्रकार कहे जानेपर गरुडके अग्रज |