मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय १५० * | ५७७ |
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| कालनेमिप्रभृतयो दश दैत्या महारथाः।<br>षष्ट्या विव्याध बाणानां कालनेमिर्जनार्दनम्॥ २२३<br>निमिः शतेन बाणानां मथनोऽशीतिभिः शरैः।<br>जम्भकश्चैव सप्तत्या शुम्भो दशभिरेव च॥ २२४<br>शेषा दैत्येश्वराः सर्वे विष्णुमेकैकशः शरैः।<br>दशभिश्चैव यत्तास्ते जघ्नुः सगरुडं रणे॥ २२५<br>तेषाममृष्य तत् कर्म विष्णुर्दानवसूदनः।<br>एकैकं दानवं जघ्ने षड्भिः षड्भिरजिह्मगैः॥ २२६<br>आकर्णकृष्टैर्भूयश्च कालनेमिस्त्रिभिः शरैः।<br>विष्णुं विव्याध हृदये क्रोधाद् रक्तविलोचनः॥ २२७<br>तस्याशोभन्त ते बाणा हृदये तप्तकाञ्चनाः।<br>मयूखानीव दीप्तानि कौस्तुभस्य स्फुटत्विषः॥ २२८<br>तैर्बाणैः किंचिदायस्तो हरिर्जग्राह मुद्गरम्।<br>सततं भ्राम्य वेगेन दानवाय व्यसर्जयत्॥ २२९<br>दानवेन्द्रस्तमप्राप्तं वियत्येव शतैः शरैः।<br>चिच्छेद तिलशः क्रुद्धो दर्शयन् पाणिलाघवम्॥ २३०<br>ततो विष्णुः प्रकुपितः प्रासं जग्राह भैरवम्।<br>तेन दैत्यस्य हृदयं ताडयामास गाढतः॥ २३१ | उस समय कालनेमिने भगवान् जनार्दनको साठ बाणोंसे, निमिने सौ बाणोंसे, मथनने अस्सी बाणोंसे, जम्भकने सत्तर और शुम्भने दस बाणोंसे बींध दिया। शेष सभी प्रयत्नशील दैत्येश्वरोंमेंसे एक-एकने रणभूमिमें गरुडसहित भगवान् विष्णुको दस-दस बाणोंसे चोटें पहुँचायीं। तब उनके उस कर्मको सहन न कर दानवोंके विनाशक भगवान् विष्णुने एक-एक दानवको सीधे चोट करनेवाले छः-छः बाणोंसे घायल कर दिया। यह देखकर कालनेमिके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। तब उसने पुनः कानतक खींचकर छोड़े गये तीन बाणोंसे भगवान् विष्णुके हृदयपर चोट की। तपाये हुए सुवर्णकी-सी कान्तिवाले कालनेमिके वे बाण विष्णुके हृदयपर उसी प्रकार शोभित हो रहे थे मानो फैलती हुई कान्तिवाले कौस्तुभ मणिकी उद्दीप्त किरणें हों। उन बाणोंके आघातसे कुछ कष्टका अनुभव कर श्रीहरिने अपना मुद्गर उठाया और उसे लगातार वेगपूर्वक घुमाकर उस दानवपर फेंक दिया। वह मुद्गर अभी उसके निकटतम पहुँचा भी न था कि क्रोधसे भरे हुए दानवराजने अपने हाथकी फुर्ती दिखलाते हुए आकाशमार्गमें ही सैकड़ों बाणोंके प्रहारसे उसे तिल-तिल करके काट डाला। यह देखकर विशेषरूपसे कुपित हुए भगवान् विष्णुने भयंकर भाला हाथमें लिया और उससे उस दैत्यके हृदयपर गहरी चोट पहुँचायी (जिसके आघातसे वह मूर्च्छित हो गया)॥ २२२–२३१॥ | | क्षणेन लब्धसंज्ञस्तु कालनेमिर्महासुरः।<br>शक्तिं जग्राह तीक्ष्णाग्रां हेमघण्टाट्टहासिनीम्॥ २३२<br>तया वामभुजं विष्णोर्बिभेद दितिनन्दनः।<br>भिन्नः शक्त्या भुजस्तस्य स्रुतशोणित आबभौ॥ २३३<br>पद्मरागमयेनेव केयूरेण विभूषितः।<br>ततो विष्णुः प्रकुपितो जग्राह विपुलं धनुः॥ २३४<br>सप्त दश च नाराचांस्तीक्ष्णान् मर्मबिभेदिनः।<br>दैत्यस्य हृदयं षड्भिर्विव्याध च त्रिभिः शरैः॥ २३५<br>चतुर्भिः सारथिं चास्य ध्वजं चैकेन पत्रिणा।<br>द्वाभ्यां ज्याधनुषी चापि भुजं सव्यं च पत्रिणा॥ २३६<br>स विद्धो हृदये गाढं दैत्यो हरिशिलीमुखैः।<br>स्रुतरक्तारुणप्रांशुः पीडाकुलितमानसः॥ २३७ | क्षणभरके पश्चात् जब उसकी चेतना लौटी, तब महासुर कालनेमिने तीखे अग्रभागवाली शक्ति हाथमें ली, जिसमें स्वर्णनिर्मित क्षुद्र घंटिकाएँ बज रही थीं। उस शक्तिसे दैत्य कालनेमिने भगवान् विष्णुकी बायीं भुजाको विदीर्ण कर दिया। शक्तिके आघातसे घायल हुई भगवान् विष्णुकी भुजा रक्त बहाती हुई ऐसी शोभा पा रही थी। मानो पद्मरागमणिके बने हुए बाजूबंदसे विभूषित की गयी हो। तब कुपित हुए भगवान् विष्णुने विशाल धनुष और सतरह तीखे एवं मर्मभेदी बाणोंको हाथमें लिया। उनमेंसे उन्होंने नौ बाणोंसे उस दैत्यके हृदयको, चार बाणोंसे उसके सारथिको, एक बाणसे ध्वजको, दो बाणोंसे प्रत्यञ्चासहित धनुषको और एक बाणसे उसकी दाहिनी भुजाको बींध दिया। उस समय भगवान् विष्णुके बाणोंसे उस दैत्यका हृदय गम्भीररूपसे घायल हो गया था, उससे रक्तकी मोटी धाराएँ निकल रही थीं, उसका मन पीडासे व्याकुल हो गया था और |