मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| तदा मृतैर्गजैरश्वैर्जनार्दनमयोधयन् ।<br>समन्तात्कोटिशो दैत्याः सर्वतः प्रत्ययोधयन् ॥ ५<br><br>बहु कृत्वा वपुर्विष्णुः किंचिच्छ्रान्तभुजोऽभवत् ।<br>उवाच च गरूत्मन्तं तस्मिन् सुतुमुले रणे ॥ ६<br><br>गरुत्मन्कच्चिदश्रान्तस्त्वमस्मिन्नपि साम्प्रतम् ।<br>यद्यश्रान्तोऽसि तद्याहि मथनस्य रथं प्रति ॥ ७<br><br>श्रान्तोऽस्यथ मुहूर्तं त्वं रणादपसृतो भव ।<br>इत्युक्तो गरुडस्तेन विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ८<br><br>आससाद रणे दैत्यं मथनं घोरदर्शनम् ।<br>दैत्यस्त्वभिमुखं दृष्ट्वा शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ ९<br><br>जघान भिन्दिपालेन शितबाणेन वक्षसि ।<br>तत्प्रहारमचिन्त्यैव विष्णुस्तस्मिन् महाहवे ॥ १०<br><br>जघान पञ्चभिर्बाणैर्मार्जितैश्च शिलाशितैः ।<br>पुनर्दशभिराकृष्टैस्तं तताड स्तनान्तरे ॥ ११<br><br>विद्धो मर्मसु दैत्येन्द्रो हरिबाणैरकम्पत ।<br>स मुहूर्तं समाश्वास्य जग्राह परिघं तदा ॥ १२<br><br>जघ्ने जनार्दनं चापि परिघेणाग्निवर्चसा ।<br>विष्णुस्तेन प्रहारेण किंचिदाघूर्णितोऽभवत् ॥ १३<br><br>ततः क्रोधविवृत्ताक्षो गदां जग्राह माधवः ।<br>मथनं सरथं रोषान्निष्पिपेषाथ रोषतः ॥ १४<br><br>स पपाताथ दैत्येन्द्रः क्षयकालेऽचलो यथा ।<br>तस्मिन् निपतिते भूमौ दानवे वीर्यशालिनि ॥ १५<br><br>अवसादं ययुर्दैत्याः कर्दमे करिणो यथा ।<br>ततस्तेषु विपन्नेषु दानवेष्वतिमानिषु ॥ १६<br><br>प्रकोपाद् रक्तनयनो महिषो दानवेश्वरः ।<br>प्रत्युद्ययौ हरिं रौद्रः स्वबाहुबलमास्थितः ॥ १७<br><br>तीक्ष्णधारेण शूलेन महिषो हरिमर्दयत् ।<br>शक्त्या च गरुडं वीरो महिषोऽभ्यहनद्धृदि ॥ १८<br><br>ततो व्यावृत्य वदनं महाचलगुहानिभम् ।<br>ग्रस्तुमैच्छद् रणे दैत्यः सगरुत्मन्तमच्युतम् ॥ १९ | तब मरे हुए हाथियों और घोड़ोंकी लाशोंसे जनार्दनके साथ युद्ध करने लगे। इस तरह करोड़ों दैत्य चारों ओरसे घेरकर उनके साथ युद्ध कर रहे थे। उस समय उस भयंकर संग्राममें भगवान् विष्णुको, जो अनेकों विग्रह (शरीर) धारण कर उनके साथ युद्ध कर रहे थे, भुजाएँ कुछ शिथिल पड़ गयीं। तब वे गरुडसे बोले—'गरुड! तुम इस युद्धमें थक तो नहीं गये हो? यदि थके न हो तो तुम मुझे मथनके रथके निकट ले चलो और यदि तुम थक गये हो तो दो घड़ीके लिये रणभूमिसे दूर हट चलो।' शक्तिशाली भगवान् विष्णुके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर गरुड रणभूमिमें भयंकर आकृतिवाले दैत्यराज मथनके निकट जा पहुँचे। दैत्यराज मथनने शङ्ख, चक्र एवं गदा धारण किये हुए विष्णुको सम्मुख उपस्थित देखकर उनके वक्षःस्थलपर भिन्दिपाल (ढेलवाँस) एवं तीखे बाणसे प्रहार किया ॥ १—९ १/२ ॥<br><br>उस महायुद्धमें दैत्यद्वारा किये गये उस प्रहारकी कुछ भी परवा न कर विष्णुने उसे ऐसे पाँच बाणोंसे घायल किया, जो पत्थरपर रगड़कर तेज किये गये थे। पुनः कानतक खींचकर छोड़े गये दस बाणोंसे उसके स्तनोंके मध्यभागमें चोट पहुँचायी। श्रीहरिके बाणोंसे मर्मस्थानोंके घायल हो जानेपर दैत्येन्द्र मथन काँपने लगा। फिर दो घड़ीके बाद आश्वस्त होकर उसने परिघ उठाया और उस अग्निके समान तेजस्वी परिघसे जनार्दनपर भी आघात किया। भगवान् विष्णु उस प्रहारसे कुछ चक्कर-सा काटने लगे। तत्पश्चात् माधवकी आँखें क्रोधसे चढ़ गयीं, तब उन्होंने गदा हाथमें ली और क्रोधपूर्वक उसके आघातसे रथसहित मथनको पीस डाला। दैत्येन्द्र मथन इस प्रकार धराशायी हो गया, जैसे प्रलयकालमें पर्वत ढह जाते हैं। उस पराक्रमशाली दानवके धराशायी हो जानेपर दैत्योंमें उसी प्रकार विषाद छा गया, मानो हाथियोंका समूह दलदलमें फँस गया हो। उन अत्यन्त अभिमानी दानवोंके इस प्रकार विपत्तिग्रस्त हो जानेपर दानवेश्वर महिषने, जिसके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये थे और जो अत्यन्त उग्र स्वभाववाला था, अपने बाहुबलका आश्रय लेकर श्रीहरिपर आक्रमण किया। उस समय महिषने श्रीहरिपर तीखी धारवाले शूलसे आघात किया। फिर वीरवर महिषने गरुडके हृदयपर शक्तिसे प्रहार किया। तत्पश्चात् उस दैत्यने रणभूमिमें विशाल पर्वतकी गुफाके समान अपने मुखको फैलाकर गरुडसहित अच्युतको निगल जानेकी चेष्टा करने लगा ॥ १०—१९ ॥ |