मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 598, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 598
५८८ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भस्मशुभ्रतनुच्छायै रुद्रैर्हंसैरिवावृतः।<br>उपस्थितार्तिर्दैत्योऽथ प्रचलत्कर्णपल्लवः॥ ४३<br><br>शम्भुं बिभेद दशनैर्नाभिदेशे गजासुरः।<br>दृष्ट्वा सक्तं तु रुद्राभ्यां नव रुद्रास्ततोऽद्रुतम्॥ ४४<br><br>ततक्षुर्विविधैः शस्त्रैः शरीरममरद्विषः।<br>निर्भया बलिनो युद्धे रणभूमौ व्यवस्थिताः॥ ४५<br><br>मृतं महिषमासाद्य वने गोमायवो यथा।<br>कपालिनं परित्यज्य गतस्त्रासुरपुंगवः॥ ४६<br><br>वेगेन कुपितो दैत्यो नवरुद्रानुपाद्रवत्।<br>ममर्द चरणाघातैर्दन्तैश्चापि करेण च॥ ४७<br><br>स तैस्तमुलयुद्धेन श्रममासादितो यदा।<br>तदा कपाली जग्राह करं तस्यामरद्विषः॥ ४८<br><br>भ्रामयामास वेगेन हृतीव च गजासुरम्।<br>दृष्ट्वा श्रमातुरं दैत्यं किंचित्स्फुरितजीवितम्॥ ४९<br><br>निरुत्साहं रणे तस्मिन् गतयुद्धोत्सवोद्यमम्।<br>ततः पतत एवास्य चर्म चोत्कृत्य भैरवम्॥ ५०<br>स्रवत्सर्वाङ्गरक्तौघं चकाराम्बरमात्मनः। | हंसोंकी तरह शरीरमें श्वेत भस्म रमाये हुए रुद्रोंसे घिरा हुआ था। इस प्रकार विपत्तिमें फँसे हुए दैत्यराज गजासुरने अपने कर्णपल्लवोंको हिलाते हुए शम्भुके नाभिदेशको दाँतोंसे विदीर्ण कर दिया। तत्पश्चात् गजासुरको कपाली और शम्भु—इन दोनों रुद्रोंके साथ उलझा हुआ देख शेष नवों रुद्र, जो रण-भूमिमें उपस्थित थे तथा महाबली एवं युद्धमें निर्भय होकर लड़नेवाले थे, उस देवद्रोहीके शरीरको विविध प्रकारके शस्त्रोंसे उसी प्रकार काटने लगे, जैसे वनमें मरे हुए भैंसेको पाकर शृगाल नोचने लगते हैं। यह देखकर असुरश्रेष्ठ गज कपालीको छोड़कर हट गया। फिर कुपित हुए उस दैत्यने बड़े वेगसे नवों रुद्रोंपर धावा किया। उसने पैरोंके आघातसे, दाँतोंके प्रहारसे तथा सूँड़के चपेटोंसे उन्हें रौंद डाला। इस प्रकार उनके साथ द्वन्द्वयुद्ध करनेसे जब वह थक गया, तब कपालीने उस देवद्रोहीके सूँड़को पकड़ लिया और वे गजासुरको बड़े वेगसे घुमाने लगे। जब उन्होंने देखा कि यह दैत्य परिश्रमसे आतुर हो गया है, उसकी युद्धके लिये अभिलाषा एवं उद्यम समाप्त हो चुके हैं, यह रणमें उत्साहीन हो गया है और अब इसके प्राणमात्र अवशेष हैं, तब उसे भूतलपर पटक दिया। उसके सभी अङ्गोंसे रक्तकी धारा बह रही थी। तब कपालीने भूतलपर पड़े हुए उस गजासुरके भयंकर चर्मको उधेड़कर अपना वस्त्र बना लिया॥ ४०—५० १/२ ॥ |
| दृष्ट्वा विनिहतं दैत्यं दानवेन्द्रा महाबलाः॥ ५१<br><br>वित्रैसुर्दुद्रुवुर्जग्मुर्निपेतुश्च सहस्रशः।<br>दृष्ट्वा कपालिनो रूपं गजचर्माम्बरावृतम्॥ ५२<br><br>दिक्षु भूमौ तमेवोग्रं रुद्रं दैत्या व्यलोकयन्।<br>एवं विलुलिते तस्मिन् दानवेन्द्रे महाबले॥ ५३<br><br>द्विपधिरूढो दैत्येन्द्रो हतदुन्दुभिना ततः।<br>कल्पान्ताम्बुधराभेण दुर्धरेणापि दानवः॥ ५४<br><br>निमिरभ्यपतत् तूर्णं सुरसैन्यानि लोडयन्।<br>यां यां निमिगजो याति दिशं तां तां सवाहनाः॥ ५५<br><br>संत्यज्य दुद्रुवुर्देवा भयार्तास्त्यक्तहेतयः।<br>गन्धेन सुरमातङ्गा दुद्रुवुस्तस्य हस्तिनः॥ ५६<br><br>पलायितेषु सैन्येषु सुराणां पाकशासनः।<br>तस्थौ दिक्पालकैः सार्धमष्टभिः केशवेन च॥ ५७ | इस प्रकार दैत्यराज गजासुरको मारा गया देखकर हजारों महाबली दानवेन्द्र भयभीत हो गये। कुछ तो रणभूमि छोड़कर भाग गये, कुछ धीरेसे खिसक गये और कुछ वहीं गिर पड़े। गजासुरके चर्मसे आच्छादित कपालीके रूपको देखकर दैत्यगण सभी दिशाओंमें तथा भूतलपर सर्वत्र उन्हीं भयंकर रुद्रको ही देख रहे थे। इस प्रकार उस महाबली दानवेन्द्र गजासुरके नष्ट हो जानेपर गजराजपर आरूढ़ हुआ दैत्येन्द्र निमि शीघ्र ही देव-सेनाओंको विलोडित करता हुआ वहाँ आ पहुँचा। उस समय उस दानवके साथ प्रलयकालीन मेघके समान दुर्धर्ष शब्द करनेवाली दुन्दुभि भी बज रही थी। निमिका वह गजराज जिस-जिस दिशाकी ओर बढ़ता था, उधर-उधरसे वाहनसहित देवगण भयभीत हो अस्त्र डालकर युद्धभूमिसे भाग खड़े होते थे। उस दैत्यके हाथीका गन्ध पाकर देवताओंके हाथी भी भागने लगे। इस प्रकार देव-सेनाओंमें भगदड़ पड़ जानेपर पाकशासन इन्द्र आठों दिक्पालों तथा भगवान् केशवके साथ खड़े रहे, किंतु |