मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 603, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 603
| * अध्याय १५३ * | ५९३ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तंतो गरुत्मतस्तस्मात् सहस्राणि विनिर्ययुः।<br>तैर्गरुत्मद्द्विरासाद्य जम्भो भुजगरूपवान्॥ ११८<br>कृतस्तु खण्डशो दैत्यः सास्य माया व्यनश्यत। | उस गारुडास्त्रसे सहस्रों गरुड प्रकट हो गये। उन गरुडोंने सर्परूपी दैत्यराज जम्भको पकड़कर उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये, जिससे उसकी वह माया नष्ट हो गयी॥ १०९—११८ १/२॥ |
| प्रनष्टायां तु मायायां ततो जम्भो महासुरः॥ ११९<br>चकार रूपमतुलं चन्द्रादित्यपथानुगम्।<br>विवृत्तवदनो ग्रस्तुमियेष सुरपुङ्गवान्॥ १२०<br>ततोऽस्य विविशुर्वक्त्रं समहारथकुञ्जराः।<br>सुरसेनाविशद् भीमं पातालोत्तानतालुकम्॥ १२१<br>सैन्येषु ग्रस्यमानेषु दानवेन बलीयसा।<br>शक्रो दैन्यं समापन्नः श्रान्तबाहुः सवाहनः॥ १२२<br>कर्तव्यतां नाध्यगच्छत् प्रोवाचेदं जनार्दनम्।<br>किमनन्तरमत्रास्ति कर्तव्यस्यावशेषितम्॥ १२३<br>यदाश्रित्य घटामोऽस्य दानवस्य युयुत्सवः।<br>ततो हरिरुवाचेदं वज्रायुधमुदारधीः॥ १२४<br>न साम्प्रतं रणस्त्याज्यस्त्वया कातरभैरवः।<br>वर्धस्वाशु महामायां पुरन्दर रिपुं प्रति॥ १२५<br>मयैष लक्षितो दैत्योऽधिष्ठितः प्राप्तपौरुषः।<br>मा शक्र मोहमागच्छ क्षिप्रमस्त्रं स्मर प्रभो॥ १२६ | तत्पश्चात् उस मायाके नष्ट हो जानेपर महासुर जम्भने सूर्य एवं चन्द्रमाके मार्गका अनुगमन करनेवाला अपना अनुपम रूप बनाया तथा मुख फैलाकर वह प्रधान-प्रधान देवताओंको निगल जानेके लिये उनकी ओर झपटा। पाताललोकतक फैले हुए तालूवाले उसके भयंकर मुखमें महारथियोंसहित बड़े-बड़े गजराज प्रवेश करने लगे। इस प्रकार सारी देव-सेना उसमें प्रविष्ट होने लगी। इस प्रकार उस बलवान् दानवद्वारा सैनिकोंको ग्रसे जाते हुए देखकर वाहनसमेत इन्द्र अत्यन्त दीन हो गये। उनकी भुजाएँ थक गयी थीं। वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये, तब उन्होंने भगवान् जनार्दनसे इस प्रकार कहा—'भगवन्! अब इस विषयमें कौन-सा कर्तव्य शेष रह गया है, जिसका आश्रय लेकर हमलोग युद्धकी इच्छासे प्रेरित हो इस दानवके साथ लोहा लें।' यह सुनकर उदारबुद्धिवाले श्रीहरि वज्रधारी इन्द्रसे इस प्रकार बोले—'पुरंदर! इस समय आपको भयभीत होकर रणभूमिसे विमुख नहीं होना चाहिये। आप शीघ्र ही शत्रुके प्रति महामायाका विस्तार करें। यह दैत्य जिस प्रकार पुरुषार्थ प्राप्तकर युद्धभूमिमें डटा हुआ है, इसे मैं जानता हूँ। सामर्थ्यशाली इन्द्र! आप मोहको मत प्राप्त हों, शीघ्र ही दूसरे अस्त्रका स्मरण कीजिये'॥ ११९—१२६॥ |
| ततः शक्रः प्रकुपितो दानवं प्रति देवराट्।<br>नारायणास्त्रं प्रयतो मुमोचासुरवक्षसि॥ १२७<br>एतस्मिन्नन्तरे दैत्यो विवृतास्योऽग्रसत्क्षणात्।<br>त्रीणि लक्षाणि गन्धर्वकिन्नरोरगराक्षसान्॥ १२८<br>ततो नारायणास्त्रं तत् पपातासुरवक्षसि।<br>महास्त्रभिन्नहृदयः सुस्राव रुधिरं च सः॥ १२९<br>रणागारमिवोद्गारं तत्याजासुरनन्दनः।<br>तदस्त्रतेजसा तस्य रूपं दैत्यस्य नाशितम्॥ १३०<br>तत एवान्तर्दधे दैत्यो वियत्यनुपलक्षितः।<br>गगनस्थः स दैत्येन्द्रः शस्त्रासनमतीन्द्रियम्॥ १३१<br>मुमोच सुरसैन्यानां संहारे कारणं परम्।<br>प्रासान् परश्वधांश्चक्रान् बाणान्वज्रान् समुद्गरान्॥ १३२ | यह सुनकर देवराज इन्द्र उस दानवके प्रति विशेष कुपित हुए और उन्होंने प्रयत्नपूर्वक उस असुरके वक्षःस्थलपर नारायणास्त्रका प्रयोग किया। इस बीचमें मुख फैलाये हुए दैत्यराज जम्भने क्षणमात्रमें तीन लाख गन्धर्वों, किन्नरों और राक्षसोंको निगल लिया। तत्पश्चात् वह नारायणास्त्र उस असुरके वक्षःस्थलपर जा गिरा। उस महान् अस्त्रके आघातसे उसका हृदय विदीर्ण हो गया और उससे रक्त बहने लगा। तब वह असुरनन्दन वमनकी तरह युद्धस्थलको छोड़कर दूर हट गया। उस अस्त्रके तेजसे उस दैत्यका रूप नष्ट हो गया था। इसके बाद वह दैत्य अदृश्य होकर आकाशमें अन्तर्हित हो गया। फिर आकाशमें स्थित होकर वह दैत्येन्द्र ऐसे इन्द्रियातीत शस्त्रोंको फेंकने लगा, जो सुर-सैनिकोंके संहारमें विशेष कारण थे। उस समय वह क्रूर दानव भाला, फरसा, चक्र, बाण, वज्र, |