मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
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| ६०० | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| यस्मिञ्जयाशा शक्रस्य दानवेन्द्ररणे त्वभूत्।<br>तारकस्य सुसम्प्राप्य शरीरं शौर्यशालिनः॥ २०२<br><br>व्यशीर्यत विकीर्णार्चिः शतधा खण्डतां गतम्।<br>विनाशमगमन्मुक्तं वायुनासुरवक्षसि॥ २०३<br><br>ज्वलितं ज्वलनाभासमङ्कुशं कुलिशं यथा।<br>विनाशमागतं दृष्ट्वा वायुश्चाङ्कुशमाहवे॥ २०४<br><br>रुष्टः शैलेन्द्रमुत्पाट्य पुष्पितद्रुमकन्दरम्।<br>चिक्षेप दानवेन्द्राय पञ्चयोजनविस्तृतम्॥ २०५<br><br>महीधरं तमायान्तं दैत्यः स्मितमुखस्तदा।<br>जग्राह वामहस्तेन बालकन्दुकलीलया॥ २०६<br><br>ततो दण्डं समुद्यम्य कृतान्तः क्रोधमूर्च्छितः।<br>दैत्येन्द्रं मूर्ध्नि चिक्षेप भ्राम्य वेगेन दुर्जयः॥ २०७<br><br>सोऽसुरस्यापतन्मूर्ध्नि दैत्यस्तं च न बुद्धवान्।<br>कल्पान्तदहनालोकामजय्यां ज्वलनस्ततः॥ २०८ | तदुपरान्त महेन्द्रने अपने चिरकालसे अर्चित वज्रको छोड़ा, जिसपर उन्हें इस दानवराजके साथ युद्धमें विजयकी पूरी आशा थी, परंतु वह पराक्रमशाली तारकके शरीरसे टकराकर चिनगारियाँ बिखेरता हुआ सैकड़ों टुकड़ोंमें तितर-बितर हो गया। फिर वायुने उस असुरके वक्षःस्थलपर अग्निके समान तेजस्वी प्रज्वलित अंकुश फेंका, किंतु वह भी वज्रकी ही भाँति विनष्ट हो गया। इस प्रकार युद्धभूमिमें अपने अंकुशको विनष्ट हुआ देखकर वायुने क्रुद्ध हो खिले हुए वृक्षों एवं कन्दराओंसे युक्त एक विशाल पर्वतको उखाड़ लिया, जो पाँच योजनमें विस्तृत था। फिर उसे दानवराजपर फेंक दिया। उस समय उस पर्वतको आते हुए देखकर दैत्यने मुसकराते हुए बालकोंकी गेंदक्रीडाके समान उसे बायें हाथसे पकड़ लिया। तदनन्तर अत्यन्त कुपित हुए दुर्जय यमराजने अपना दण्ड उठाया और उसे वेगपूर्वक घुमाकर दैत्येन्द्रके मस्तकपर फेंक दिया। वह दण्ड असुरके मस्तकपर गिरा तो अवश्य, परंतु दैत्यको उसका कुछ भी ज्ञान न हुआ॥ १९९-२०७ ½॥ |
| शक्तिं चिक्षेप दुर्धर्षां दानवेन्द्राय संयुगे।<br>नवा शिरीषमालेव सास्य वक्ष्यस्यराजत॥ २०९<br><br>ततः खड्गं समाकृष्य कोपादाकाशनिर्मलम्।<br>भासितासितदिग्भागं लोकपालोऽपि निर्ऋतिः॥ २१०<br><br>चिक्षेप दानवेन्द्राय तस्य मूर्ध्नि पपात च।<br>पतितश्चागमत् खड्गः स शीघ्रं शतखण्डताम्॥ २११<br><br>जलेशस्तूग्रदुर्धर्षं विषपावकभैरवम्।<br>मुमोच पाशं दैत्यस्य भुजबन्धाभिलाषकः॥ २१२<br><br>स दैत्यभुजमासाद्य सर्पः सद्यो व्यपद्यत।<br>स्फुटितक्रकचक्रूरदशनालिर्महानुः॥ २१३<br><br>ततोऽश्विनौ समरुतः ससाध्याः समहोरगाः।<br>यक्षराक्षसगन्धर्वा दिव्यनानाश्रपाणयः॥ २१४<br><br>जघ्नुर्दैत्येश्वरं सर्वे सम्भूय सुमहाबलाः।<br>न चास्त्राण्यस्य सज्जन्त गात्रे वज्राचलोपमे॥ २१५ | तदुपरान्त अग्निने युद्धभूमिमें दानवेन्द्रपर अपनी शक्ति छोड़ी, जो प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्विनी, अजेय और दुर्धर्ष थी, किंतु वह उसके वक्षःस्थलपर नवीन शिरीष-पुष्पोंकी मालाकी तरह सुशोभित हुई। तत्पश्चात् लोकपाल निर्ऋतिने भी अपने आकाशके समान निर्मल एवं समस्त दिशाओंको उद्भासित करनेवाले खड्गको म्यानसे खींचकर उस दानवेन्द्रपर चला दिया और वह उसके मस्तकपर जा गिरा, परंतु गिरते ही वह खड्ग शीघ्र ही सैकड़ों टुकड़ोंमें चूर-चूर हो गया। इसके बाद वरुणने उस दैत्यकी भुजाओंको बाँध देनेकी अभिलाषासे अपना दुर्धर्ष तथा विष एवं अग्निके समान भयंकर पाश फेंका, किंतु वह सर्प-पाश दैत्यकी भुजापर पहुँचकर तुरंत ही नष्ट हो गया, उसकी आरेके समान क्रूर दन्तपङ्क्ति तथा विशाल ठोड़ी टूट-फूटकर नष्ट हो गयी। तदनन्तर अश्विनीकुमार, मरुद्गण, साध्यगण, बड़े-बड़े नाग, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व—ये सभी महाबली देवगण हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र धारण कर एक साथ उस दैत्यराजपर प्रहार करने लगे, परंतु वज्र एवं पर्वत-सरीखे उसके शरीरपर उन अस्त्रोंका कोई प्रभाव न पड़ा॥ २०८-२१५॥ |
| ततो रथादवप्लुत्य तारको दानवाधिपः।<br>जघान कोटिशो देवान् करपार्ष्णिभिरेव च॥ २१६ | तत्पश्चात् दानवराज तारकने रथसे कूदकर घूँसों एवं पैरोंकी ठोकरोंसे करोड़ों देवताओंका कचूमर निकाल |