भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 1098 में से

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पृष्ठ 614

६०४ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अकिञ्चित्करतां यातः करस्ते न विभासते।<br>अलं नीलोत्पलाभेन चक्रेण मधुसूदन॥ २५<br><br>किं त्वयानुदरालीनभुवनप्रविलोकनम्।<br>क्रियते स्तिमिताक्षेण भवता विश्वतोमुख॥ २६चली गयी? तुमलोगोंके भी उस तेजको किसने नष्ट कर दिया? मधुसूदन! आपका हाथ कर्तव्यहीन हो गया है, जिससे इसकी शोभा नहीं हो रही है। इस नीले कमलकी-सी कान्तिवाले चक्रके धारण करनेसे क्या लाभ? विश्वतोमुख! इस समय आप नेत्र बंद करके अपने उदरमें विलीन हुए भुवनोंका अवलोकन क्यों कर रहे हैं?॥ १८—२६॥
एवमुक्ताः सुरास्तेन ब्रह्मणा ब्रह्ममूर्तिना।<br>वाचां प्रधानभूतत्वान्मारुतं तमचोदयन्॥ २७<br><br>अथ विष्णुमुखैर्देवैः श्वसनः प्रतिबोधितः।<br>चतुर्मुखं तदा प्राह चराचरगुरुं विभुम्॥ २८उन वेदमूर्ति ब्रह्माद्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर देवताओंने वाणी-शक्तिके मुख्य कारण वायुको प्रेरित किया। उस समय विष्णु आदि देवताओंने वायुको भलीभाँति समझा दिया, तब वे ऐश्वर्यशाली एवं चराचर प्राणियोंके गुरु ब्रह्मासे बोले— ॥ २७-२८॥
न तु वेत्सि चराचरभूतगतं<br>भवभावमतीव महानुच्छितः प्रभवः।<br>पुनरर्थिवचोऽभिविस्तृत-<br>श्रवणोपमकौतुकभावकृतः॥ २९<br><br>त्वमनन्त करोषि जगद्द्रवतां<br>सचराचरगर्भविभिन्नगुणाम्।<br>अमरासुरमेतदशेषमपि<br>त्वयि तुल्यमहो जनकोऽसि यतः।<br>पितुरस्ति तथापि मनोविकृतिः<br>सगुणो विगुणो बलवानबलः॥ ३०<br><br>भवतो वरलाभनिवृत्तभयः<br>कुलिशाङ्गसुतो दितिजोऽतिबलः।<br>सचराचर निर्मथने किमिति<br>कितवस्तु कृतो विहितो भवता॥ ३१<br><br>किल देव त्वया स्थितये जगतां<br>महदद्भुतचित्रविचित्रगुणाः।<br>अपि तुष्टिकृतः श्रुतकामफला<br>विहिता द्विजनायक देवगणाः॥ ३२<br><br>अपि नाकमभूत् किल यज्ञभुजां<br>भवतो विनियोगवशात् सततम्।<br>अपहृत्य विमानगणं स कृतो<br>दितिजेन महामरुभूमिसमः॥ ३३'भगवन्! चराचर प्राणियोंके मनोंमें उत्पन्न हुए भावोंको आप न जानते हों—ऐसी बात नहीं है। आप अत्यन्त महान्, सर्वोपरि और जगत्के उत्पत्तिस्थान हैं। यह तो आपने केवल याचकोंके वचनोंको विस्तारपूर्वक सुननेके लिये कुतूहलका भाव प्रकट किया है। अनन्त! आप चराचर प्राणियोंसे युक्त विभिन्न गुणवाली विश्व-सृष्टि करते हैं। यद्यपि ये सम्पूर्ण देवता और असुर आपकी दृष्टिमें एक-से हैं; क्योंकि आप ही सबको उत्पन्न करनेवाले हैं, तथापि पिताके मनमें भी पुत्रोंके सगुण-निर्गुण एवं सबल-निर्बलरूप पक्षको लेकर अन्तर रहता ही है। आपसे वरदान प्राप्त कर निर्भय हुआ वज्राङ्गका पुत्र महाबली धूर्त दैत्य तारक चराचर जगत्का नाश करनेके लिये क्या कर रहा है, यह आपको (भलीभाँति) विदित है। देव! क्या आपने जगत्की स्थितिके लिये महान् एवं अद्भुत चित्र-विचित्र गुणोंसे युक्त, संतुष्ट करनेवाले एवं वाञ्छित अभिलाषाओंकी पूर्ति करनेवाले देवगणोंकी सृष्टि नहीं की थी? द्विजनायक! क्या आपके आदेशानुसार स्वर्गलोक सदा यज्ञभोजी देवताओंके अधिकारमें नहीं रहता आया है, किंतु उस दैत्यने विमानसमूहोंको छीनकर उसे महान् मरुस्थल-सा बना दिया है॥ २९—३३॥
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