मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६२० * मत्स्यपुराण *
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| शङ्करस्तमथाकर्ण्य मधुरं मदनाश्रयम्॥ २३६<br>सस्मार दक्षदुहितां दयितां रक्तमानसः।<br>ततः सा तस्य शनकैस्तिरोभूयातिनिर्मला ॥ २३७<br>समाधिभावना तस्थौ लक्ष्यप्रत्यक्षरूपिणी।<br>ततस्तन्मयतां यातः प्रत्यूहपिहिताशयः॥ २३८<br>वशित्वेन बुबोधेशो विकृतिं मदनात्मिकाम्।<br>ईषत्कोपसमाविष्टो धैर्यमालम्ब्य धूर्जटिः॥ २३९<br>निरासे मदनस्थित्या योगमायासमावृतः।<br>स तया माययाऽऽविष्टो जज्वाल मदनस्ततः॥ २४०<br>इच्छाशरीरो दुर्जेयो रोषदोषमहाश्रयः।<br>हृदयान्निर्गतः सोऽथ वासनाव्यसनात्मकः॥ २४१<br>बहिःस्थलं समालम्ब्य ह्युपतस्थौ झषध्वजः।<br>अनुयातोऽथ हृद्येन मित्रेण मधुना सह॥ २४२<br>सहकारतरौ दृष्ट्वा मृदुमारुतनिर्धूतम्।<br>स्तबकं मदनो रम्यं हरवक्षसि सत्वरम्॥ २४३<br>मुमोच मोहनं नाम मार्गणं मकरध्वजः।<br>शिवस्य हृदये शुद्धे नाशशाली महाशरः॥ २४४<br>पपात परुषप्रांशुः पुष्पबाणो विमोहनः।<br>ततः करणसंदेहो विद्धस्तु हृदये भवः॥ २४५<br>बभूव भूधरौपम्यधैर्योऽपि मदनोन्मुखः।<br>ततः प्रभुत्वाद्भावानां नावेशं समपद्यत॥ २४६<br>बाह्यं बहु समासाद्य प्रत्यूहप्रसवात्मकम्।<br>ततः कोपानलोद्भूतघोरहुङ्कारभीषणे॥ २४७ | भ्रमरोंकी उस मधुर झंकारको सुनकर शङ्करजीका मन कामदेवके प्रभावसे अनुरक्त हो गया। तब उन्होंने अपनी प्रिया दक्षकन्या सतीका स्मरण किया। उस समय उनकी वह लक्ष्यको प्रत्यक्षरूपमें प्रकट करनेवाली अत्यन्त निर्मल समाधिभावना धीरे-धीरे तिरोहित हो गयी। वे विघ्नोंद्वारा लक्ष्यके अवरुद्ध हो जानेसे सतीकी तन्मयताको प्राप्त हो गये। थोड़ी देर बाद जितेन्द्रिय होनेके कारण शङ्करजी इस कामजन्य विकारको समझ गये। फिर तो उनमें थोड़ा क्रोधकी झलक आ गयी। तब उन जटाधारीने धैर्य धारणकर अपनेको कामदेवकी स्थितिसे मुक्त करनेके लिये योगमायाका आश्रय लिया। उस मायासे आविष्ट होनेके कारण कामदेव जलने लगा। तत्पश्चात् जो वासना और दुर्व्यसनका मूर्तरूप, स्वेच्छानुसार शरीर धारण करनेवाला, अजेय, क्रोध और दोषका महान् आश्रयस्थान था, वह कामदेव शङ्करजीके हृदयसे बाहर निकला और एक बाहरी स्थानका सहारा लेकर निकट ही खड़ा हो गया। उस समय उसका परम स्नेही मित्र मधु (चैत्रमास या वसन्त) भी उसके साथ था। वहाँ आमके वृक्षपर मन्द वायुसे हिलाये गये रमणीय पुष्पगुच्छको देखकर मकरध्वज कामदेवने शीघ्र ही शङ्करजीके वक्षःस्थलपर वह मोहन नामक बाण छोड़ा। वह विमोहन नामक पुष्पबाण विनाशकारी, महान् प्रभावशाली, कठोर और विशाल था। वह शङ्करजीके शुद्ध हृदयपर जा गिरा। जिससे उनका हृदय घायल हो गया और उनकी इन्द्रियाँ विचलित हो गयीं। फिर तो पर्वतके समान धैर्यशाली होनेपर भी शङ्करजी कामोन्मुख हो गये, किंतु अनेकों बाहरी विघ्नसमूहोंके प्राप्त होनेपर भी सद्भावोंके प्रभुत्वके कारण उनमें कामका आवेश विशेषरूपसे नहीं हुआ॥ २३६-२४६ १/२ ॥ |
| बभूव वदने नेत्रं तृतीयमनलाकुलम्।<br>रुद्रस्य रौद्रवपुषो जगत्संहारभैरवम्॥ २४८<br>तदन्तिकस्थे मदने व्यस्फारयत धूर्जटिः।<br>तं नेत्रविस्फुलिङ्गेन क्रोशतां नाकवासिनाम्॥ २४९<br>गमितो भस्मसात् तूर्णं कंदर्पः कामिदर्पकः।<br>स तु तं भस्मसात्कृत्वा हरनेत्रोद्भवोऽनलः॥ २५० | तदुपरान्त क्रोधाग्निसे उत्पन्न हुए भयंकर हुंकारके भयानक शब्दसे युक्त मुखके ऊपर क्रोधाग्निसे उद्दीप्त तीसरा नेत्र प्रकट हो गया, जो भीषण रूपधारी शङ्करजीका जगत्का संहार करनेवाला भयानक रूप था। तब जटाधारी शङ्करजीने अपने निकट ही खड़े हुए कामदेवकी ओर दृष्टिपात किया। फिर तो उस नेत्रसे निकली हुई एक चिनगारीने तुरंत ही कामियोंके दर्पको बढ़ाने-वाले कामदेवको जलाकर भस्म कर दिया। यह देखकर स्वर्गवासी हाहाकार मचा रहे थे। इस प्रकार शङ्करजीके नेत्रसे उद्भूत हुई अग्नि कामदेवको भस्म कर |