मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ
पृष्ठ 654, कुल 1098 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 654
६४४ * मत्स्यपुराण *
| Sanskrit Shloka | Hindi Translation |
|---|---|
| तच्छ्रुत्वा कौतुकाद् देवी किमेतदिति शङ्करम्।<br>पप्रच्छ तं शुभतनुर्हरं विस्मयपूर्वकम्॥ ५२३<br>उवाच देवीं नैतत् ते दृष्टपूर्वं सुविस्मिते।<br>एते गणेशाः क्रीडन्ते शैलेऽस्मिन् मत्प्रियाः सदा॥ ५२४<br>तपसा ब्रह्मचर्येण नियमैः क्षेत्रसेवनैः।<br>यैरहं तोषितः पूर्वं त एते मनुजोत्तमाः॥ ५२५<br>मत्समीपमनुप्राप्ता मम हृद्याः शुभानने।<br>कामरूपा महोत्साहा महारूपगुणान्विताः॥ ५२६<br>कर्मभिर्विस्मयं तेषां प्रयामि बलशालिनाम्।<br>सामरस्यास्य जगतः सृष्टिसंहरणक्षमाः॥ ५२७<br>ब्रह्मविष्ण्विन्द्रगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः।<br>विवर्जितोऽप्यहं नित्यं नैभिर्विरहितो रमे॥ ५२८<br>हृद्या मे चारुसर्वाङ्गास्त एते क्रीडिता गिरौ।<br>इत्युक्ता तु ततो देवी त्यक्त्वा तद्विस्मयाकुला॥ ५२९<br>गवाक्षान्तरमासाद्य प्रेक्षते विस्मितानना। | उसे सुनकर सुन्दर शरीरवाली पार्वतीदेवीने कुतूहलवश आश्चर्यपूर्वक भगवान् शंकरसे पूछा—'यह क्या हो रहा है?' तब शिवजीने पार्वतीसे कहा—'सुविस्मिते! तुमने पहले इसे नहीं देखा है। मेरे परम प्रिय ये गणेश्वर इस पर्वतपर सदा क्रीडा करते रहते हैं। शुभानने! जो लोग पहले तपस्या, ब्रह्मचर्य, नियमपालन और तीर्थसेवनद्वारा मुझे संतुष्ट कर चुके हैं, वे ही ये श्रेष्ठ पुरुष मेरे पास प्राप्त हुए हैं। ये मुझे परम प्रिय हैं। ये इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले, महान् उत्साहसे सम्पन्न तथा अतिशय सौन्दर्य एवं गुणोंसे युक्त हैं। इन बलशालियोंके कार्योंसे तो मुझे भी परम विस्मय हो जाता है। ये देवताओंसहित इस जगत्की सृष्टि और संहार करनेमें समर्थ हैं। अतः ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, गन्धर्व, किंनर और प्रधान-प्रधान नागोंसे नित्य विलग रहनेपर भी मुझे कष्ट नहीं होता, परंतु इनसे वियुक्त होनेपर मुझे कभी आनन्द नहीं प्राप्त होता। इनके सभी अङ्ग अत्यन्त सुन्दर हैं और ये सभी मुझे परम प्रिय हैं। वे ही ये सब इस पर्वतपर क्रीडा कर रहे हैं।' इस प्रकार कही जानेपर पार्वतींने विस्मयसे व्याकुल हो द्यूतक्रीडा छोड़ दी और वे भौंचक्की-सी हो झरोखेमें बैठकर उनकी ओर देखने लगीं॥ ५२२—५२९ १/२ ॥ |
| यावन्तस्ते कृशा दीर्घा ह्रस्वाः स्थूला महोदराः॥ ५३०<br>व्याघ्रेभवदनाः केचित् केचिन्मेषाजरूपिणः।<br>अनेकप्राणिरूपाश्च ज्वालास्याः कृष्णपिङ्गलाः॥ ५३१<br>सौम्या भीमाः स्मितमुखाः कृष्णपिङ्गजटासटाः।<br>नानाविहङ्गवदना नानाविधमृगाननाः॥ ५३२<br>कौशेयचर्मवसना नग्नाश्चान्ये विरूपिणः।<br>गोकर्णा गजकर्णाश्च बहुवक्त्रेक्षणोदराः॥ ५३३<br>बहुपादा बहुभुजा दिव्यनानाशस्त्रपाणयः।<br>अनेककुसुमापीडा नानाव्यालविभूषणाः॥ ५३४<br>वृत्ताननायुधधरा नानाकवचभूषणाः।<br>विचित्रवाहनारूढा दिव्यरूपा वियच्चराः॥ ५३५ | वे जितने थे, उनमें कुछ दुबले-पतले, लम्बे, छोटे और विशाल पेटवाले थे। किन्हींके मुख व्याघ्र और हाथीके समान थे तो कोई भेड़ और बकरेके-से रूपवाले थे। उनके रूप अनेकों प्राणियोंके सदृश थे। किन्हींके मुखसे ज्वाला निकल रही थी तो कोई काले एवं पीले रंगके थे। किन्हींके मुख सौम्य, किन्हींके भयंकर और किन्हींके मुसकानयुक्त थे। किन्हींके मस्तकपर काले एवं पीले रंगकी जटा बँधी थी। किन्हींके मुख नाना प्रकारके पक्षियोंके-से तथा किन्हींके मुख विभिन्न प्रकारके पशुओं-सदृश थे। किन्हींके शरीरपर रेशमी वस्त्र थे तो कोई वस्त्रके स्थानपर चमड़ा ही लपेटे हुए थे और कुछ नंगे ही थे। कुछ अत्यन्त कुरूप थे। किन्हींके कान गौ-सरीखे थे तो किन्हींके कान हाथी-जैसे थे। किन्हींके बहुत-से मुख, नेत्र और पेट थे तो किन्हींके बहुत-से पैर और भुजाएँ थीं। उनके हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्यास्त्र शोभा पा रहे थे। किन्हींके मस्तकोंपर नाना प्रकारके पुष्प बँधे हुए थे तो कोई अनेकविध सर्पोंके ही आभूषण धारण किये हुए थे। कोई गोल मुखवाले अस्त्र लिये हुए थे तो कोई विभिन्न प्रकारके कवचोंसे विभूषित थे। कुछ दिव्य रूपधारी थे और विचित्र वाहनोंपर आरूढ़ हो आकाशमें विचर रहे थे। |