मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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६८२ * मत्स्यपुराण *
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| दीप्तान्यन्तर्जंलस्थानि पृथिवीधरणानि च।<br>तदा क्रुद्धेन महता कम्पितानि समन्ततः॥५८<br>नागास्तेजोधराश्चापि पातालतलचारिणः।<br>हिरण्यकशिपुर्द्दैत्यस्तदा संस्पृष्टवान् महीम्॥५९<br>संदष्टौष्ठपुटः क्रोधाद्वारह इव पूर्वजः। | उसने चारों ओर जलके भीतर स्थित रहनेवाले उदीप्त पर्वतोंको भी अत्यन्त क्रोधवश कँपा दिया। उस समय पाताललोकमें विचरण करनेवाले तेजस्वी नाग भी प्रकम्पित हो उठे। इस प्रकार दैत्यराज हिरण्यकशिपु क्रोधवश दाँतोंसे होंठोंको दबाये हुए जब पृथ्वीपर खड़ा हुआ तो वह पूर्वकालमें प्रकट हुए वाराहकी तरह दीख रहा था॥५०—५९१/२॥ |
| नदी भागीरथी चैव शरयूः कौशिकी तथा॥६०<br>यमुना त्वथ कावेरी कृष्णवेणा च निम्नगा।<br>सुवेणा च महाभागा नदी गोदावरी तथा॥६१<br>चर्मण्वती च सिन्धुश्च तथा नदनदीपतिः।<br>कमलप्रभवश्चैव शोणो मणिनिभोदकः॥६२<br>नर्मदा शुभतोया च तथा वेत्रवती नदी।<br>गोमती गोकुलाकीर्णा तथा पूर्वसरस्वती॥६३<br>मही कालमही चैव तमसा पुष्पवाहिनी।<br>जम्बूद्वीपं रत्नवटं सर्वरत्नोपशोभितम्॥६४<br>सुवर्णप्रकटं चैव सुवर्णकरमण्डितम्।<br>महानदं च लौहित्यं शैलकाननशोभितम्॥६५<br>पत्तनं कोशकरणमृषिवीरजनाकरम्।<br>मागधाश्च महाग्रामा मुण्डाः शृङ्गास्तथैव च॥६६<br>सुह्मा मल्ला विदेहाश्च मालवाः काशिकोसलाः।<br>भवनं वैनतेयस्य दैत्येन्द्रेणाभिकम्पितम्॥६७<br>कैलासशिखराकारं यत् कृतं विश्वकर्मणा।<br>रक्ततोयो महाभीमो लौहित्यो नाम सागरः॥६८<br>उदयश्च महाशैल उत्थितः शतयोजनम्।<br>सुवर्णवेदिकः श्रीमान् मेघपङ्क्तिनिषेवितः॥६९<br>भ्राजमानोऽर्कसदृशैर्जातरूपमयैर्द्रुमैः।<br>शालैस्तालैस्तमालैश्च कर्णिकारैश्च पुष्पितैः॥७०<br>अयोमुखश्च विख्यातः पर्वतो धातुमण्डितः।<br>तमालवनगन्धश्च पर्वतो मलयः शुभः॥७१<br>सुराष्ट्राश्च सबाहीकाः शूराभीरास्तथैव च।<br>भोजाः पाण्ड्याश्च वङ्गाश्च कलिङ्गास्ताम्रलिप्तकाः॥७२<br>तथैवोण्ड्राश्च पौण्ड्राश्च वामचूडाः सकेरलाः।<br>क्षोभितास्तेन दैत्येन सदेवाश्चाप्सरोगणाः॥७३ | इसी प्रकार भागीरथी नदी, सरयू, कौशिकी, यमुना, कावेरी, कृष्णवेणा नदी, महाभागा, सुवेणा, गोदावरी नदी, चर्मण्वती, सिन्धु, नद और नदियोंका स्वामी, कमल उत्पन्न करनेवाला तथा मणिसदृश जलसे परिपूर्ण शोण, पुण्यसलिला नर्मदा, वेत्रवती नदी, गोकुलसे सेवित होनेवाली गोमती, प्राचीसरस्वती, मही, कालमही, तमसा, पुष्पवाहिनी, जम्बूद्वीप, सम्पूर्ण रत्नोंसे सुशोभित रत्नवट, सुवर्णकी खानोंसे युक्त सुवर्णप्रकट, पर्वतों और काननोंसे सुशोभित महानद लौहित्य, ऋषियों और वीरजनोंका उत्पत्तिस्थानस्वरूप कोशकरण नामक नगर, बड़े-बड़े ग्रामोंसे युक्त मागध, मुण्ड, शृङ्ग, सुह्म, मल्ल, विदेह, मालव, काशी, कोसल—इन सबको तथा गरुडके भवनको, जो कैलासके शिखरकी-सी आकृतिवाला था तथा जिसे विश्वकर्माने बनाया था, उस दैत्येन्द्रने प्रकम्पित कर दिया। रक्तरूपी जलसे भरा हुआ महान् भयंकर लौहित्य सागर तथा जो स्वर्णमयी वेदिकासे युक्त, शोभाशाली, मेघकी पङ्क्तियोंद्वारा सुसेवित और सूर्य-सदृश एवं स्वर्णमय खिले हुए साल, ताल, तमाल और कनेरके वृक्षोंसे सुशोभित है, वह सौ योजन ऊँचा महान् पर्वत उदयाचल, धातुओंसे विभूषित अयोमुख नामक विख्यात पर्वत, तमाल-वनके गन्धसे सुवासित सुन्दर मलय पर्वत, सुराष्ट्र, बाहीक, शूर, आभीर, भोज, पाण्ड्य, वङ्ग, कलिङ्ग, ताम्रलिप्तक, उण्ड्र, पौण्ड्र, केरल—इन सबको तथा देवों और अप्सराओंके समूहोंको उस दैत्यने क्षुब्ध कर दिया॥६०–७३॥ |
| अगस्त्यभवनं चैव यदगम्यं कृतं पुरा।<br>सिद्धचारणसङ्घैश्च विप्रकीर्णं मनोहरम्॥७४ | इसी प्रकार जो पहले अगम्य कर दिया गया था तथा सिद्धों और चारणोंके समूहोंसे व्याप्त, |