मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६८४ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| खेचराश्च सतीपुत्राः पातालतलवासिनः।<br>गणस्तथा परो रौद्रो मेघनामाङ्कुशायुधः॥ ९१<br>ऊर्ध्वगो भीमवेगश्च सर्व एवाभिकम्पिताः।<br>गदी शूली करालश्च हिरण्यकशिपुस्तदा॥ ९२<br>जीमूतघनसङ्काशो जीमूतघननिःस्वनः।<br>जीमूतघननिर्घोषो जीमूत इव वेगवान्॥ ९३<br>देवारिर्दितिजो वीरो नृसिंहं समुपाद्रवत्।<br>समुत्पत्य ततस्तीक्ष्णैर्मृगेन्द्रेण महानखैः॥ ९४<br>तदोंकारसहायेन विदार्य निहतो युधि। | आकाशचारी एवं पाताललोकमें निवास करनेवाले सतीके पुत्र, अङ्कुशको अस्त्ररूपमें धारण करनेवाला परम भयंकर मेघ नामक गण तथा ऊर्ध्वग और भीमवेग—ये सभी कँपा दिये गये। तदनन्तर जो गदा और त्रिशूल धारण किये हुए था, जिसकी आकृति बड़ी विकराल थी, जो देवताओंका शत्रु, घने बादलके समान कान्तिमान्, घने बादल-जैसा बोलनेवाला, घने बादल-सदृश गरजनेवाला और बादल-सा वेगशाली था, उस दितिनन्दन वीरवर हिरण्यकशिपुने भगवान् नरसिंहपर आक्रमण किया। तब युद्धस्थलमें ओंकारकी सहायतासे भगवान् नरसिंहने आकाशमें उछलकर अपने तीखे विशाल नखोंसे उनके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर उसे मार डाला॥ ८५—९४ १/२॥ |
| मही च कालश्च शशी नभश्च<br>ग्रहाश्च सूर्यश्च दिशश्च सर्वाः।<br>नद्यश्च शैलाश्च महार्णवाश्च<br>गताः प्रसादं दितिपुत्रनाशात्॥ ९५<br>ततः प्रमुदिता देवा ऋषयश्च तपोधनाः।<br>तुष्टुवुर्नामभिर्दिव्यैरादिदेवं सनातनम्॥ ९६<br>यत्त्वया विहितं देव नारसिंहमिदं वपुः।<br>एतदेवार्चयिष्यन्ति परावरविदो जनाः॥ ९७ | इस प्रकार उस दितिपुत्र हिरण्यकशिपुके मौतके मुखमें चले जानेसे पृथ्वी, काल, चन्द्रमा, आकाश, ग्रहगण, सूर्य, सभी दिशाएँ, नदियाँ, पर्वत और महासागर प्रसन्न हो गये। तदनन्तर हर्षसे फूले हुए देवता और तपोधन ऋषिगण दिव्य नामोंद्वारा उन अविनाशी आदि देवकी स्तुति करते हुए कहने लगे—'देव! आपने जो यह नरसिंहका शरीर धारण किया है, इसकी पूर्वापरके ज्ञाता लोग अर्चना करेंगे'॥ ९५—९७॥ |
| ब्रह्मोवाच<br>भवान् ब्रह्मा च रुद्रश्च महेन्द्रो देवसत्तमः।<br>भवान् कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाव्ययः॥ ९८<br>परां च सिद्धिं च परं च देवं<br>परं च मन्त्रं परमं हविश्च।<br>परं च धर्मं परमं च विश्वं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ ९९<br>परं शरीरं परमं च ब्रह्म<br>परं च योगं परमां च वाणीम्।<br>परं रहस्यं परमां गतिं च<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १००<br>एवं परस्यापि परं पदं यत्<br>परं परस्यापि परं च देवम्।<br>परं परस्यापि परं च भूतं<br>त्वामाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम्॥ १०१ | ब्रह्माजीने कहा—देव! आप ही ब्रह्मा, रुद्र और देवश्रेष्ठ महेन्द्र हैं। आप ही लोकोंके कर्ता, संहर्ता और उत्पत्तिस्थान हैं। आपका कभी विनाश नहीं होता। आपको ही परमोत्कृष्ट सिद्धि, परात्पर देव, परम मन्त्र, परम हवि, परम धर्म, परम विश्व और आदि पुराणपुरुष कहा जाता है। आपको ही परम शरीर, परम ब्रह्म, परम योग, परमा वाणी, परम रहस्य, परम गति और अग्रजन्मा पुराण पुरुष कहा जाता है। इसी प्रकार जो परात्पर पद, परात्पर देव, परात्पर भूत और सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष है, वह आप ही हैं। |