मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ६८६ | * मत्स्यपुराण * |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रभावात् पद्मनाभस्य स्वपतः सागराम्भसि।<br>पुष्करे च कथं भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा॥ ५<br>एनमाख्याहि निखिलं योगं योगविदां पते।<br>शृण्वतस्तस्य मे कीर्तिं न तृप्तिरुपजायते॥ ६<br>कियता चैव कालेन शेते वै पुरुषोत्तमः।<br>कियन्तं वा स्वपिति च कोऽस्य कालस्य सम्भवः॥ ७<br>कियता वाथ कालेन ह्युत्तिष्ठति महायशाः।<br>कथं चोत्थाय भगवान् सृजते निखिलं जगत्॥ ८<br>के प्रजापतयस्तावदासन् पूर्वं महामुने।<br>कथं निर्मितावांश्चैव चित्रं लोकं सनातनम्॥ ९<br>कथमेकार्णवे शून्ये नष्टस्थावरजङ्गमे।<br>दग्धे देवासुरनरे प्रनष्टोरगराक्षसे॥ १०<br>नष्टानिलानले लोके नष्टाकाशमहीतले।<br>केवलं गह्वरीभूते महाभूतविपर्यये॥ ११<br>विभुर्महाभूतपतिर्महातेजा महाकृतिः।<br>आस्ते सुरवरश्रेष्ठो विधिमास्थाय योगवित्॥ १२<br>शृणुयां परया भक्त्या ब्रह्मैनेतदशेषतः।<br>वक्तुमर्हसि धर्मिष्ठ यशो नारायणात्मकम्॥ १३<br>श्रद्धया चोपविष्टानां भगवन् वक्तुमर्हसि॥ १४ | पूर्वकालमें समुद्रके जलमें शयन करनेवाले भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे उस कमलमें ऋषिगणोंसहित देवगण कैसे उत्पन्न हुए थे? योगवेत्ताओंके अधीश्वर! इस सम्पूर्ण योगका वर्णन कीजिये; क्योंकि भगवान्की कीर्तिका वर्णन सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है। (कृपया यह बतलाइये कि) भगवान् पुरुषोत्तम कितने समयके पश्चात् शयन करते हैं? कितने कालतक सोते हैं? इस कालका उद्भव (निर्धारण) कहाँसे होता है? फिर वे महायशस्वी भगवान् कितने समयके बाद निद्रा त्यागकर उठते हैं? निद्रासे उठकर वे भगवान् किस प्रकार सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करते हैं? महामुने! पूर्वकालमें कौन-कौन-से प्रजापति थे? इस विचित्र सनातन लोकका निर्माण किस प्रकार किया गया था? महाप्रलयके समय जब स्थावर-जङ्गम-सभी प्राणी नष्ट हो जाते हैं, देवता, राक्षस और मनुष्य जलकर भस्म हो जाते हैं, नागों और राक्षसोंका विनाश हो जाता है, लोकमें अग्नि, वायु, आकाश और पृथ्वीतलका सर्वथा लोप हो जाता है, उस समय पञ्चमहाभूतोंका विपर्यय हो जानेपर केवल घना अन्धकार छाया रहता है, तब उस शून्य एकार्णवके जलमें सर्वव्यापी, पञ्चमहाभूतोंके स्वामी, महातेजस्वी, विशालकाय, सुरेश्वरोंमें श्रेष्ठ एवं योगवेत्ता भगवान् किस प्रकार विधिका सहारा लेकर स्थित रहते हैं? ब्रह्मन्! यह सारा प्रसङ्ग मैं परम भक्तिके साथ सुनना चाहता हूँ। धर्मिष्ठ! आप इस नारायण-सम्बन्धी यशका वर्णन कीजिये। भगवन्! हमलोग श्रद्धापूर्वक आपके समक्ष बैठे हैं, अतः आप इसका अवश्य वर्णन कीजिये॥ ४—१४ ॥ |
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
| नारायणस्य यशसः श्रवणे या तव स्पृहा।<br>तद्वंश्यान्वयभूतस्य न्याय्यं रविकुलर्षभ॥ १५<br>शृणुष्वादिपुराणेषु वेदेभ्यश्च यथा श्रुतम्।<br>ब्राह्मणानां च वदतां श्रुत्वा वै सुमहात्मनाम्॥ १६<br>यथा च तपसा दृष्ट्वा बृहस्पतिसमद्युतिः।<br>पराशरसुतः श्रीमान् गुरुद्वैपायनोऽब्रवीत्॥ १७<br>तत्तेऽहं कथयिष्यामि यथाशक्ति यथाश्रुति।<br>यद्विज्ञातुं मया शक्यमृषिमात्रेण सत्तमाः॥ १८<br>कः समुत्सहते ज्ञातुं परं नारायणात्मकम्।<br>विश्वायनश्च यद् ब्रह्मा न वेदयति तत्त्वतः॥ १९ | सूर्यकुलसत्तम! नारायणकी यशोगाथा सुननेमें जो आपकी विशेष स्पृहा है, यह नारायणके वंशजोंके कुलमें उत्पन्न होनेवाले आपके लिये उचित ही है। मैंने पुराणों, वेदों तथा प्रवचनकर्ता श्रेष्ठ महात्मा ब्राह्मणोंके मुखसे जैसा सुना है तथा बृहस्पतिके समान कान्तिमान् पराशरनन्दन गुरुदेव श्रीमान् कृष्णद्वैपायन व्यासजीने तपोबलसे साक्षात्कार करके जैसा मुझे बतलाया है, वही मैं अपनी जानकारीके अनुसार यथाशक्ति आपसे वर्णन कर रहा हूँ, सावधानीपूर्वक श्रवण कीजिये। द्विजवरो! जिसे ऋषियोंमें केवल मैं ही जान सकता हूँ। जिसे विश्वके आश्रयस्थान ब्रह्मा भी तत्त्वपूर्वक नहीं जानते, नारायणके उस परम तत्त्वको जाननेके लिये दूसरा कौन उत्साह कर सकता है। |