भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,098 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

६९२ * मत्स्यपुराण *


एक सौ सड़सठवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुका एकार्णवके जलमें शयन, मार्कण्डेयको आश्चर्य तथा भगवान् विष्णु और मार्कण्डेयका संवाद

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
एवमेकार्णवीभूते शेते लोके महाद्युतिः।<br>प्रच्छाद्य सलिलेनोर्वीं हंसो नारायणस्तदा॥ १<br>महतो रजसो मध्ये महार्णवसरःसु वै।<br>विरजस्कं महाबाहुमक्षयं ब्रह्म यं विदुः॥ २<br>आत्मरूपप्रकाशेन तमसा संवृतः प्रभुः।<br>मनः सात्त्विकमाधाय यत्र तत्सत्यमासत॥ ३<br>याथातथ्यं परं ज्ञानं भूतं तद् ब्रह्मणा पुरा।<br>रहस्यारण्यकोद्दिष्टं यच्चौपनिषदं स्मृतम्॥ ४<br>पुरुषो यज्ञ इत्येतद्यत्परं परिकीर्तितम्।<br>यश्चान्यः पुरुषाख्यः स्यात् स एष पुरुषोत्तमः॥ ५<br>ये च यज्ञकरा विप्रा ये चर्त्विज इति स्मृताः।<br>अस्मादेव पुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयतां तथा॥ ६<br>ब्रह्माणं प्रथमं वक्त्रादुद्गातारं च सामगम्।<br>होतारमपि चाध्वर्युं बाहुभ्यामवसृजत् प्रभुः॥ ७<br>ब्रह्मणो ब्राह्मणाच्छंसि प्रस्तोतारं च सर्वशः।<br>तौ मित्रावरुणौ पृष्ठात् प्रतिप्रस्तारमेव च॥ ८<br>उदरात् प्रतिहर्तारं पोतारं चैव पार्थिव।<br>अच्छावाकमथोरुभ्यां नेष्टारं चैव पार्थिव॥ ९<br>पाणिभ्यामथ चाग्नीध्रं सुब्रह्मण्यं च जानुतः।<br>ग्रावस्तुतं तु पादाभ्यामुन्नेतारं च याजुषम्॥ १०राजर्षे ! इस प्रकार जगत्‌के एकार्णवके जलमें निमग्न हो जानेपर परम कान्तिमान् हंसस्वरूपी नारायण पृथ्वीको जलसे भलीभाँति आच्छादित कर विशाल रेतीले टापूके मध्यमें स्थित उस महार्णवके सरोवरमें शयन करते हैं। उन्हीं महाबाहुको रजोगुणरहित अविनाशी ब्रह्म कहा जाता है। अन्धकारसे आच्छादित हुए भगवान् अपने स्वरूपके प्रकाशसे प्रकाशित हो मनको सत्त्वगुणमें स्थापितकर वहाँ विराजित होते हैं। वे ही सत्यस्वरूप हैं। यथार्थ परम ज्ञान भी वे ही हैं, जिसका पूर्वकालमें ब्रह्मा ने अनुभव किया था। वे ही आरण्यकोंद्वारा उपदिष्ट रहस्य और उपनिषत्प्रतिपादित ज्ञान हैं। उन्हींको परमोत्कृष्ट यज्ञपुरुष कहा गया है। इसके अतिरिक्त जो दूसरा पुरुष नामसे विख्यात है, वह पुरुषोत्तम भी वे ही हैं। जो यज्ञपरायण ब्राह्मण और जो ऋत्विज् कहे गये हैं, वे सभी पूर्वकालमें इन्हींसे उत्पन्न हुए थे। अब यज्ञोंके विषयमें सुनिये। राजन् ! उन प्रभुने सर्वप्रथम मुखसे ब्रह्मा और सामगान करनेवाले उद्गाताको, दोनों भुजाओंसे होता और अध्वर्युको, ब्रह्मासे ब्राह्मणाच्छंसी और प्रस्तोताको, पृष्ठभागसे मैत्रावरुण और प्रतिप्रस्तोताको, उदरसे प्रतिहर्ता और पोताको, ऊरुओंसे अच्छावाक् और नेष्टाको, हाथोंसे आग्नीध्रको, जानुओंसे सुब्रह्मण्यको तथा पैरोंसे ग्रावस्तुत और यजुर्वेदी उन्नेताको उत्पन्न किया॥ १—१०॥
एवमेवैष भगवान् षोडशैव जगत्पतिः।<br>प्रवक्तॄन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान्॥ ११इस प्रकार इन जगदीश्वर भगवान्‌ने सम्पूर्ण यज्ञोंके प्रवक्ता सोलह श्रेष्ठ ऋत्विजोंको उत्पन्न किया।
तदेष वै वेदमयः पुरुषो यज्ञसंस्थितः।<br>वेदाश्चैतन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदक्रियाः॥ १२ये ही वेदमय पुरुष यज्ञोंमें भी स्थित रहते हैं। सभी वेद और उपनिषदोंकी साङ्गोपाङ्ग क्रियाएँ इन्हींके स्वरूप हैं।
स्वपित्येकार्णवे चैव यदाश्चर्यमभूत् पुरा।<br>श्रूयन्तां तद्यथा विप्रा मार्कण्डेयकुतूहलम्॥ १३विप्रवरो! पूर्वकालमें एकार्णवके जलमें शयन करते समय मार्कण्डेय मुनिको कुतूहल उत्पन्न करनेवाली एक आश्चर्यजनक घटना घटित हुई थी। अब आप उसे सुनिये।
गीर्णो भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनिः।<br>बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा॥ १४भगवान्‌द्वारा निगले गये महामुनि मार्कण्डेय उन्हींकी कुक्षिमें उन्हींके श्रेष्ठ तेजसे कई हजार वर्षोंकी आयुतक भ्रमण करते