भारतकोश
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 722

७१२ * मत्स्यपुराण *

Sanskrit ShlokaHindi Meaning
तारमुक्तक्रोशविस्तारं सर्वं हेममयं रथम्।<br>शैलाकारमसम्बाधं नीलाञ्जनचयोपमम्॥ ९<br>कार्ष्णायसमयं दिव्यं लोहेषाबद्धकूबरम्।<br>तिमिरोद्गारिकिरणं गर्जन्तमिव तोयदम्॥ १०<br>लोहजालेन महता सगवाक्षेण दंशितम्।<br>आयसैः परिघैः पूर्णं क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः॥ ११<br>प्रासैः पाशैश्च विततैस्संयुक्तश्च कण्टकैः।<br>शोभितं त्रासयानैश्च तोमरैश्च परश्वधैः॥ १२<br>उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम्।<br>युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम्॥ १३<br>विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः।<br>प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः॥ १४<br>युक्तं रथसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः।<br>स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः॥ १५<br>व्यायतं किष्कुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत्।<br>वाराहः प्रमुखे तस्थौ सप्ररोह इवाचलः॥ १६<br>खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम्।<br>स्फुरद्दन्तोष्ठनयनं संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत॥ १७इसी प्रकार जो अत्यन्त ऊँचा और दूरतक शब्द करनेवाला था, जिसके सभी अङ्ग स्वर्णमय थे, जो आकारमें पर्वतके समान और नीलाञ्जनकी राशि-सा दीख रहा था, काले लोहेका बना हुआ था, जिसके लोहेके हरसेमें कूबर बँधा हुआ था, जिसमें कहीं-कहीं अंधकारको फाड़कर किरणें चमक रही थीं, जो बादलकी तरह गर्जना कर रहा था, लोहेकी विशाल जाली और झरोखोंसे सुशोभित था, लोहनिर्मित परिघ, क्षेपणीय (ढेलवाँस) और मुद्गरोंसे परिपूर्ण था, भाला, पाश, बड़े-बड़े शङ्कु, कण्टक, भयदायक तोमर और कुठारोंसे सुशोभित था, शत्रुओंसे युद्ध करनेके लिये उद्यत दूसरे मन्दराचलकी भाँति दीख रहा था तथा जिसमें एक हजार गधे जुते हुए थे, ऐसे उत्तम दिव्य रथपर तारकासुर सवार हुआ। क्रोधसे भरा हुआ विरोचन हाथमें गदा लिये हुए उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हुआ। वह देदीप्यमान शिखरवाले पर्वतके समान लग रहा था। शत्रुसेनाका मर्दन करनेवाले दानवश्रेष्ठ हयग्रीवने एक हजार रथके साथ अपने रथको आगे बढ़ाया। वाराह नामक दानव अपने एक हजार किष्कु* लम्बे विशाल धनुषका टंकार करते हुए सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ, जो वृक्षोंसहित पर्वत-सा दीख रहा था। खर नामक दैत्य अभिमानवश नेत्रोंसे रोषजनित जल गिराता हुआ संग्रामके लिये उद्यत हुआ, उस समय उसके दाँत, होंठ और नेत्र फड़क रहे थे॥ ९-१७॥
त्वष्टा त्वष्टगजं घोरं यानमास्थाय दानवः।<br>व्यूहितुं दानवव्यूहं परिचक्राम वीर्यवान्॥ १८<br>विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः।<br>श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखे स्थितः॥ १९<br>अरिष्टो बलिपुत्रश्च वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधः।<br>युद्धायाभिमुखस्तस्थौ धराधरविकम्पनः॥ २०<br>किशोरस्त्वभिसंहर्षात्किशोर इति चोदितः।<br>सबला दानवाश्चैव सन्नह्यन्ते यथाक्रमम्॥ २१<br>अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः।<br>लम्बस्तु नवमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः॥ २२<br>दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान्।<br>स्वर्भानुरास्ययोधी तु दशनोष्ठेक्षणायुधः॥ २३इसी प्रकार पराक्रमी दानवराज त्वष्टा, जिसमें आठ हाथी जुते हुए थे, ऐसे भयंकर रथपर बैठकर दानवसेनाको व्यूहबद्ध करनेका प्रयत्न करने लगा। विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत, जो श्वेत पर्वतके समान विशालकाय और श्वेत कुण्डलोंसे विभूषित था, युद्धके लिये सेनाके अग्रभागमें स्थित हुआ। बलिक पुत्र अरिष्ट, जो महान् बलसम्पन्न और पर्वतको कँपा देनेवाला था तथा पर्वत-शिलाएँ जिसकी आयुधभूता थीं, युद्धकी कामनासे सेनाके सम्मुख खड़ा हुआ। किशोर नामक दैत्य प्रेरित किये गये सिंह-किशोरकी तरह अत्यन्त हर्षके साथ दैत्य-सेनाके मध्यभागमें उपस्थित हुआ, जो उदयकालीन सूर्य-सा प्रतीत हो रहा था। नवीन मेघकी-सी कान्तिवाला लम्ब नामक दानव, जो लम्बे वस्त्रों और आभूषणोंसे विभूषित था, दैत्यसेनामें पहुँचकर कुहासेसे घिरे हुए सूर्यकी तरह शोभा पा रहा था। महान् ग्रह राहु, जो मुख, दाँत, होंठ और नेत्रोंसे युद्ध करनेवाला

* बीस अंगुल या मतान्तरसे एक हाथका प्राचीन माप।